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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 17

62 Sukta
24 Mantra
3/53/17
Devata- रथाङ्गानि Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्थि॒रौ गावौ॑ भवतां वी॒ळुरक्षो॒ मेषा वि व॑र्हि॒ मा यु॒गं वि शा॑रि। इन्द्रः॑ पात॒ल्ये॑ ददतां॒ शरी॑तो॒ररि॑ष्टनेमे अ॒भि नः॑ सचस्व॥

स्थि॒रौ । गावौ॑ । भ॒व॒ता॒म् । वी॒ळुः । अक्षः॑ । मा । ई॒षा । वि । व॒र्हि॒ । मा । यु॒गम् । वि । शा॒रि॒ । इन्द्रः॑ । पा॒त॒ल्ये॒ इति॑ । द॒द॒ता॒म् । शरी॑तोः । अरि॑ष्टऽनेमे । अ॒भि । नः॒ । स॒च॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
स्थिरौ गावौ भवतां वीळुरक्षो मेषा वि वर्हि मा युगं वि शारि। इन्द्रः पातल्ये ददतां शरीतोररिष्टनेमे अभि नः सचस्व॥

स्थिरौ। गावौ। भवताम्। वीळुः। अक्षः। मा। ईषा। वि। वर्हि। मा। युगम्। वि। शारि। इन्द्रः। पातल्ये३ इति। ददताम्। शरीतोः। अरिष्टऽनेमे। अभि। नः। सचस्व॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अरिष्टनेमे) नहीं नाश होनेवाले कर्मों को प्राप्त करानेवाले ! आप (इन्द्रः) ऐश्वर्यवाले (शरीतोः) दुष्ट स्वभाव से युक्त के नाश करने में समर्थ हुए (पातल्ये) गिरनेवाले में (ददताम्) दीजिये और (वीळुः) प्रशंसायुक्त (अक्षः) इन्द्रिय के छिद्र को (ईषा) नाश करनेवाला हुआ (स्थिरौ) निश्चल (गावौ) बैलों का (मा) नहीं (वि, शारि) नाश करे (युगम्) वर्ष को (मा) नहीं (वि, वर्हि) बन्ध्या हो जिससे कि निश्चल बैल (भवताम्) होवें जिससे आप (नः) हम लोगों से (अभि, सचस्व) सब प्रकार मिलो ॥१७॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि बड़े उपकार करनेवाले गौ आदि पशुओं का कभी नाश नहीं करें और व्यर्थ समय न बितावें, श्रेष्ठ पुरुषों के साथ सदा ही मेल की रक्षा करें ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।