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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 16

62 Sukta
24 Mantra
3/53/16
Devata- वाक् Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒स॒र्प॒रीर॑भर॒त्तूय॑मे॒भ्योऽधि॒ श्रवः॒ पाञ्च॑जन्यासु कृ॒ष्टिषु॑। सा प॒क्ष्या॒३॒॑ नव्य॒मायु॒र्दधा॑ना॒ यां मे॑ पलस्तिजमद॒ग्नयो॑ द॒दुः॥

स॒स॒र्प॒रीः । अ॒भ॒र॒त् । तूय॑म् । ए॒भ्यः॒ । अधि॑ । श्रवः॑ । पाञ्च॑ऽजन्यासु । कृ॒ष्टिषु॑ । सा । प॒क्ष्या॑ । नव्य॑म् । आयुः॑ । दधा॑ना । याम् । मे॒ । प॒ल॒स्तिऽज॒म॒द॒ग्नयः॑ । द॒दुः ॥

Mantra without Swara
ससर्परीरभरत्तूयमेभ्योऽधि श्रवः पाञ्चजन्यासु कृष्टिषु। सा पक्ष्या३ नव्यमायुर्दधाना यां मे पलस्तिजमदग्नयो ददुः॥

ससर्परीः। अभरत्। तूयम्। एभ्यः। अधि। श्रवः। पाञ्चऽजन्यासु। कृष्टिषु। सा। पक्ष्या। नव्यम्। आयुः। दधाना। याम्। मे। पलस्तिऽजमदग्नयः। ददुः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (पलस्तिजमदग्नयः) जाना है प्राजापत्य आदि अग्नियों को जिन्होंने वे और अवस्था और ज्ञान में वृद्ध पुरुष (याम्) जिसको (ददुः) देवें (सा) वह (पक्ष्या) पक्षों में साध्वी (पाञ्चजन्यासु) पाँच दिनों तथा प्राणों में उत्पन्न (कृष्टिषु) मनुष्य आदि प्रजाओं में (नव्यम्) नवीन ही (आयुः) अन्न वा जीवन को (दधाना) धारण करती हुई (एभ्यः) इन जानने की इच्छा करनेवालों के लिये (श्रवः) अन्न को (अधि) उपरि भाग में (तूयम्) शीघ्र (ददुः) देवें (ससर्परीः) सुख की बढ़ानेवाली (अभरत्) प्राप्त कराइये ॥१६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो कार्य की सिद्धि और ऐश्वर्य की उत्पन्न करने और अवस्था की बढ़ानेवाली सत्य लक्षणों से स्पष्ट वाली नवीन-नवीन विज्ञान और जीवन धारण करती है, उसको नित्य धारण करो ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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