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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 15

62 Sukta
24 Mantra
3/53/15
Devata- वाक् Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒स॒र्प॒रीरम॑तिं॒ बाध॑माना बृ॒हन्मि॑माय ज॒मद॑ग्निदत्ता। आ सूर्य॑स्य दुहि॒ता त॑तान॒ श्रवो॑ दे॒वेष्व॒मृत॑मजु॒र्यम्॥

स॒स॒र्प॒रीः । अम॑तिम् । बाध॑माना । बृ॒हत् । मि॒मा॒य॒ । ज॒मद॑ग्निऽदत्ता । आ । सूर्य॑स्य । दु॒हि॒ता । त॒ता॒न॒ । श्रवः॑ । दे॒वेषु॑ । अ॒मृत॑म् । अ॒जु॒र्यम् ॥

Mantra without Swara
ससर्परीरमतिं बाधमाना बृहन्मिमाय जमदग्निदत्ता। आ सूर्यस्य दुहिता ततान श्रवो देवेष्वमृतमजुर्यम्॥

ससर्परीः। अमतिम्। बाधमाना। बृहत्। मिमाय। जमदग्निऽदत्ता। आ। सूर्यस्य। दुहिता। ततान। श्रवः। देवेषु। अमृतम्। अजुर्यम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (जमदग्निदत्ता) नेत्र से प्रत्यक्ष दी गई (ससर्परीः) अत्यन्त चलनेवाली वाणी (अजुर्य्यम्) हानि से रहित (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की (दुहिता) कन्या के सदृश वर्त्तमान अन्धकार को नाश करते हुए प्रातःकाल के सदृश (बृहत्) बड़े (अमतिम्) रूप को (मिमाय) नापती है और (देवेषु) विद्वानों में हानिरहित (अमृतम्) अमृत स्वरूप (श्रवः) सुनने का (आ, ततान) विस्तार करती है, उस वाणी की सब प्रकार वृद्धि करो ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य धर्म का अनुष्ठान और पुरुषार्थों से श्रेष्ठ पुरुषों के समीप से विद्या और उत्तम शिक्षा को मनुष्य ग्रहण करें तो उनको कुछ भी सुख अप्राप्त न होवे ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।