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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 11

62 Sukta
24 Mantra
3/53/11
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॒ प्रेत॑ कुशिकाश्चे॒तय॑ध्व॒मश्वं॑ रा॒ये प्र मु॑ञ्चता सु॒दासः॑। राजा॑ वृ॒त्रं ज॑ङ्घन॒त्प्रागपा॒गुद॒गथा॑ यजाते॒ वर॒ आ पृ॑थि॒व्याः॥

उप॑ । प्र । इ॒त॒ । कु॒शि॒काः॒ । चे॒तय॑ध्वम् । अश्व॑म् । रा॒ये । प्र । मु॒ञ्च॒त॒ । सु॒ऽदासः॑ । राजा॑ । वृ॒त्रम् । ज॒ङ्घ॒न॒त् । प्राक् । अपा॑क् । उद॑क् । अथ॑ । य॒जा॒ते॒ । वरे॑ । आ । पृ॒थि॒व्याः ॥

Mantra without Swara
उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वमश्वं राये प्र मुञ्चता सुदासः। राजा वृत्रं जङ्घनत्प्रागपागुदगथा यजाते वर आ पृथिव्याः॥

उप। प्र। इत। कुशिकाः। चेतयध्वम्। अश्वम्। राये। प्र। मुञ्चत। सुऽदासः। राजा। वृत्रम्। जङ्घनत्। प्राक्। अपाक्। उदक्। अथ। यजाते। वरे। आ। पृथिव्याः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 21 Mantra » 1

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Meaning
हे (कुशिकाः) जो करते और उपदेश देते वे कुश वे श्रेष्ठ विद्यमान हैं जिनमें वे कुशिक और जो (सुदासः) उत्तम दान देनेवाला (राजा) प्रकाशमान (प्राक्) प्रथम (अपाक्) पश्चिम और (उदक्) उत्तर से (वृत्रम्) मेघ के सदृश शत्रु का (जङ्घनत्) अत्यन्त नाश करैं (अथ) इसके अनन्तर (पृथिव्याः) पृथिवी के (वरे) उत्तम स्थान में (आ, यजाते) यज्ञ करे उसका (राये) लक्ष्मी के लिये (प्र) (मुञ्चत) त्याग करो और उस (अश्वम्) घोड़े के सदृश शीघ्र चलनेवाली बिजुली को (चेतयध्वम्) जनाओ और (उप, प्र, इत) प्राप्त होओ ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानों ! जो वीर लोग शत्रुओं का नाश करें, उनके लिये बहुत धन और प्रतिष्ठा को देवें, जिससे सम्पूर्ण दिशाओं में विजय प्रकाशित होवे ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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