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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 1

62 Sukta
24 Mantra
3/53/1
Devata- इन्द्रापर्वतौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑पर्वता बृह॒ता रथे॑न वा॒मीरिष॒ आ व॑हतं सु॒वीराः॑। वी॒तं ह॒व्यान्य॑ध्व॒रेषु॑ देवा॒ वर्धे॑थां गी॒र्भिरिळ॑या॒ मद॑न्ता॥

इन्द्रा॑पर्वता । बृ॒ह॒ता । रथे॑न । वा॒मीः । इषः॑ । आ । व॒ह॒त॒म् । सु॒ऽवीराः॑ । वी॒तम् । ह॒व्यानि॑ । अ॒ध्व॒रेषु॑ । दे॒वा॒ । वर्धे॑थाम् । गीः॒ऽभिः । इळि॑या । मद॑न्ता ॥

Mantra without Swara
इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः। वीतं हव्यान्यध्वरेषु देवा वर्धेथां गीर्भिरिळया मदन्ता॥

इन्द्रापर्वता। बृहता। रथेन। वामीः। इषः। आ। वहतम्। सुऽवीराः। वीतम्। हव्यानि। अध्वरेषु। देवा। वर्धेथाम्। गीःऽभिः। इळया। मदन्ता॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभा और सेना के ईश ! आप दोनों (इन्द्रापर्वता) बिजुली और मेघ के सदृश राज्य सेना के अधीश (बृहता) बड़े (रथेन) वाहन से (सुवीराः) सुन्दर वीर जिनसे उन (वामीः) श्रेष्ठ (इषः) अन्न आदि को (आ, वहतम्) प्राप्त होइये और (अध्वरेषु) नहीं हिंसा करने योग्य यज्ञों में (हव्यानि) देने और ग्रहण करने योग्यों को (वीतम्) प्राप्त होइये और (इळया) सम्पूर्ण शास्त्रों को प्रकाश करनेवाली वाणी से (मदन्ता) कामना करते हुए विद्वान् लोग (देवा) उत्तम सुख देनेवाले होकर (गीर्भिः) उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त वाणियों से (वर्धेथाम्) बढ़ें ॥१॥
Essence
हे राजसेनाओं के जन ! जैसे मेघ सम्पूर्ण जलाशय और ओषधियों की रक्षा करता है, वैसे ही सेना के पालन करनेवाले पुरुष बहुत सी सामग्रियों से सम्पूर्ण सेनाओं को भोग से परिपूर्ण करिये और सेना बिजुलियों के सदृश शत्रुओं का नाश करैं और सबमें सब युद्ध और राजविद्या में परिपूर्ण होकर सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त हों ॥१॥
Subject
अब चौबीस ऋचावाले तिरेपनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा की सेना के विषय को कहते हैं।