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Rigveda Mandal 3 / Sukta 52 / Mantra 7

62 Sukta
8 Mantra
3/52/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पू॒ष॒ण्वते॑ ते चकृमा कर॒म्भं हरि॑वते॒ हर्य॑श्वाय धा॒नाः। अ॒पू॒पम॑द्धि॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॒ सोमं॑ पिब वृत्र॒हा शू॑र वि॒द्वान्॥

पू॒ष॒ण्ऽवते॑ । ते॒ । च॒कृ॒म॒ । क॒र॒म्भम् । हरि॑ऽवते । हरि॑ऽअश्वाय । धा॒नाः । अ॒पू॒पम् । अ॒द्धि॒ । सऽग॑णः । म॒रुत्ऽभिः॑ । सोम॑म् । पि॒ब॒ । वृ॒त्र॒ऽहा । शू॒र॒ । वि॒द्वान् ॥

Mantra without Swara
पूषण्वते ते चकृमा करम्भं हरिवते हर्यश्वाय धानाः। अपूपमद्धि सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्॥

पूषण्ऽवते। ते। चकृम। करम्भम्। हरिऽवते। हरिऽअश्वाय। धानाः। अपूपम्। अद्धि। सऽगणः। मरुत्ऽभिः। सोमम्। पिब। वृत्रऽहा। शूर। विद्वान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुष्ट पुरुष के नाशकर्त्ता ! जैसे (वृत्रहा) धन से युक्त विद्वान् पुरुष (पूषण्वते) पुष्टि करनेवाले विद्यमान हैं जिसके उस (हरिवते) उत्तम घोड़े आदि से युक्त के तथा (हर्य्यश्वाय) हरणशील और शीघ्र चालवाले घोड़े वा अग्नि आदि विद्यमान हैं जिसके उस (ते) आपके लिये (करम्भम्) दधि आदि से युक्त भोजन करने के पदार्थ विशेष और (धानाः) भूँजे हुए अन्न तथा (अपूपम्) पुआ को देवे उसको (सगणः) समूह के सहित वर्त्तमान आप (मरुद्भिः) उत्तम मनुष्यों के साथ (अद्धि) भक्षण कीजिये और (सोमम्) उत्तम ओषधि के रस को (पिब) पान कीजिये और वैसे ही हम लोग आपके लिये (चकृम) करें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्या नम्रता से युक्त हैं, वे श्रेष्ठ राजा के लिये उत्तम पदार्थों को देकर इसका निरन्तर सत्कार करें और वे राजा से भी सर्वदा सत्कार के योग्य हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।