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Rigveda Mandal 3 / Sukta 52 / Mantra 6

62 Sukta
8 Mantra
3/52/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तृ॒तीये॑ धा॒नाः सव॑ने पुरुष्टुत पुरो॒ळाश॒माहु॑तं मामहस्व नः। ऋ॒भु॒मन्तं॒ वाज॑वन्तं त्वा कवे॒ प्रय॑स्वन्त॒ उप॑ शिक्षेम धी॒तिभिः॑॥

तृ॒तीये॑ । धा॒नाः । सव॑ने । पु॒रु॒ऽस्तु॒त॒ । पु॒रो॒ळाश॑म् । आऽहु॑तम् । म॒म॒ह॒स्व॒ । नः॒ । ऋ॒भु॒ऽमन्त॑म् । वाज॑ऽवन्तम् । त्वा॒ । क॒वे॒ । प्रय॑स्वन्तः । उप॑ । शि॒क्षे॒म॒ । धी॒तिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
तृतीये धानाः सवने पुरुष्टुत पुरोळाशमाहुतं मामहस्व नः। ऋभुमन्तं वाजवन्तं त्वा कवे प्रयस्वन्त उप शिक्षेम धीतिभिः॥

तृतीये। धानाः। सवने। पुरुऽस्तुत। पुरोळाशम्। आऽहुतम्। ममहस्व। नः। ऋभुऽमन्तम्। वाजऽवन्तम्। त्वा। कवे। प्रयस्वन्तः। उप। शिक्षेम। धीतिऽभिः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे (पुरुष्टुत) बहुतों से प्रशंसित (कवे) विद्वान् पुरुष ! (प्रयस्वन्तः) प्रयत्न करते हुए हम लोग (धीतिभिः) अङ्गुलियों से दिखाये गये वचनार्थों से (तृतीये) तीन की पूर्त्ति करनेवाले (सवने) सायंकाल में करने योग्य कर्म में (पुरोळाशम्) उत्तम संस्कारयुक्त अन्न विशेष और (धानाः) अग्नि से भूँजे गये अन्न विशेषों के तुल्य (ऋभुमन्तम्) श्रेष्ठ बुद्धिमानों से युक्त (वाजवन्तम्) शुष्क अन्न विशेष विद्यमान जिसके उस (आहुतम्) पुकारे गये (त्वा) आपको (उप, शिक्षेम) शिक्षा देवैं वह आप (नः) हम लोगों का (मामहस्व) अत्यन्त सत्कार करिये ॥६॥
Essence
जैसे विद्वान् यज्ञ करनेवाले यजमानों के लिये यज्ञ कृत्य की शिक्षा देते हैं, वैसे ही संपूर्ण विद्याओं का हस्त आदि क्रियाओं से प्रत्यक्ष अर्थात् अभ्यास करके अन्य जनों के लिये अध्यापक लोग प्रत्यक्ष करावें ॥६॥
Subject
अब अध्यापक के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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