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Rigveda Mandal 3 / Sukta 52 / Mantra 5

62 Sukta
8 Mantra
3/52/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
माध्य॑न्दिनस्य॒ सव॑नस्य धा॒नाः पु॑रो॒ळाश॑मिन्द्र कृष्वे॒ह चारु॑म्। प्र यत्स्तो॒ता ज॑रि॒ता तूर्ण्य॑र्थो वृषा॒यमा॑ण॒ उप॑ गी॒र्भिरीट्टे॑॥

माध्य॑न्दिनस्य । सव॑नस्य । धा॒नाः । पु॒रो॒ळास॑म् । इ॒न्द्र॒ । कृ॒ष्व॒ । इ॒ह । चारु॑म् । प्र । यत् । स्तो॒ता । ज॒रि॒ता । तूर्णि॑ऽअर्थः । वृ॒ष॒ऽयमा॑णः । उप॑ । गीः॒ऽभिः । ईट्टे॑ ॥

Mantra without Swara
माध्यन्दिनस्य सवनस्य धानाः पुरोळाशमिन्द्र कृष्वेह चारुम्। प्र यत्स्तोता जरिता तूर्ण्यर्थो वृषायमाण उप गीर्भिरीट्टे॥

माध्यन्दिनस्य। सवनस्य। धानाः। पुरोळासम्। इन्द्र। कृष्व। इह। चारुम्। प्र। यत्। स्तोता। जरिता। तूर्णिऽअर्थः। वृषऽयमाणः। उप। गीःऽभिः। ईट्टे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) प्रतापयुक्त ! आप (माध्यन्दिनस्य) मध्य दिन में होनेवाले (सवनस्य) कर्म विशेष के मध्य में जो (धानाः) भूँजे हुए अन्न और (चारुम्) भक्षण करने योग्य सुन्दर (पुरोडाशम्) अन्न विशेष का आप (इह) इस उत्तम कर्म में (कृष्व) संग्रह कीजिये और (यत्) जो (वृषायमाणः) बल को करनेवाला (तूर्ण्यर्थः) शीघ्र है प्रयोजन जिसका वह (जरिता) आपका सेवाकारी और (स्तोता) प्रशंसा करनेवाला (उप) समीप में (गीर्भिः) वाणियों से (प्र, उप) समीप में (ईट्टे) ऐश्वर्य्यवान् हो, वह आपके सत्कार करने योग्य होवे ॥५॥
Essence
जो राजा के जन ऋत्विजों के सदृश राज्य की वृद्धि करैं, उनको राजा सत्कार से प्रसन्न करे ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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