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Rigveda Mandal 3 / Sukta 52 / Mantra 4

62 Sukta
8 Mantra
3/52/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु॒रो॒ळाशं॑ सनश्रुत प्रातःसा॒वे जु॑षस्व नः। इन्द्र॒ क्रतु॒र्हि ते॑ बृ॒हन्॥

पु॒रो॒ळास॑म् । स॒न॒ऽश्रु॒त॒ । प्रा॒तः॒ऽसा॒वे । जु॒ष॒स्व॒ । नः॒ । इन्द्र॑ । क्रतुः॑ । हि । ते॒ । बृ॒हन् ॥

Mantra without Swara
पुरोळाशं सनश्रुत प्रातःसावे जुषस्व नः। इन्द्र क्रतुर्हि ते बृहन्॥

पुरोळासम्। सनऽश्रुत। प्रातःऽसावे। जुषस्व। नः। इन्द्र। क्रतुः। हि। ते। बृहन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 4

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Meaning
हे (सनश्रुत) सत्य और असत्य के विचारकर्त्ताओं से उत्तम कृत्य सुना जिसने ऐसे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (हि) जिससे (ते) आपकी (क्रतुः) बुद्धि वा कर्म्म (बृहन्) बड़ा है तिससे आप (प्रातःसावे) जो प्रातःकाल में किया जाय उसमें (नः) हम लोगों के (पुरोडाशम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्नविशेष का (जुषस्व) सेवन करो ॥४॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जिन पुरुषों में जैसी विद्या और शीलता होवे, वैसी ही उन पर उत्तम कृपा करें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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