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Rigveda Mandal 3 / Sukta 52 / Mantra 3

62 Sukta
8 Mantra
3/52/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु॒रो॒ळाशं॑ च नो॒ घसो॑ जो॒षया॑से॒ गिर॑श्च नः। व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम्॥

पु॒रो॒ळास॑म् । च॒ । नः॒ । घसः॑ । जो॒षया॑से । गिरः॑ । च॒ । नः॒ । व॒धू॒युःऽइ॑व । योष॑णाम् ॥

Mantra without Swara
पुरोळाशं च नो घसो जोषयासे गिरश्च नः। वधूयुरिव योषणाम्॥

पुरोळासम्। च। नः। घसः। जोषयासे। गिरः। च। नः। वधूयुःऽइव। योषणाम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 17 Mantra » 3

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Meaning
हे राजन् ! आप (नः) हम लोगों के (पुरोळाशम्) प्रथम देने के योग्य का (घसः) भक्षण करो और हम लोगों के लिये भक्षण कराओ (च) और (योषणाम्) अपनी स्त्री को (वधूयुरिव) अपनी स्त्री विषयिणी इच्छा करनेवाले के सदृश (नः) हम लोगों की (जोषयासे) सेवा करो (च) और हम लोग आपकी (गिरः) वाणियों का (जोषयेम) सेवन करैं ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा और प्रजाजन आपस के ऐश्वर्य्य को अपना ही समझें और जैसे स्त्री की कामना करनेवाला पुरुष प्रिया स्त्री को प्राप्त होकर आनन्दित होता है, वैसे ही राजा धर्म करनेवाली प्रजाओं को प्राप्त कर निरन्तर प्रसन्न होवें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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