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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 8

62 Sukta
12 Mantra
3/51/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स वा॑वशा॒न इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॑ म॒रुद्भि॑रिन्द्र॒ सखि॑भिः सु॒तं नः॑। जा॒तं यत्त्वा॒ परि॑ दे॒वा अभू॑षन्म॒हे भरा॑य पुरुहूत॒ विश्वे॑॥

सः । वा॒व॒शा॒नः । इ॒ह । पा॒हि॒ । सोम॑म् । म॒रुत्ऽभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । सखि॑ऽभिः । सु॒तम् । नः॒ । जा॒तम् । यत् । त्वा॒ । परि॑ । दे॒वाः । अभू॑षन् । म॒हे । भरा॑य । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । विश्वे॑ ॥

Mantra without Swara
स वावशान इह पाहि सोमं मरुद्भिरिन्द्र सखिभिः सुतं नः। जातं यत्त्वा परि देवा अभूषन्महे भराय पुरुहूत विश्वे॥

सः। वावशानः। इह। पाहि। सोमम्। मरुत्ऽभिः। इन्द्र। सखिऽभिः। सुतम्। नः। जातम्। यत्। त्वा। परि। देवाः। अभूषन्। महे। भराय। पुरुऽहूत। विश्वे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त ! (इह) इस राज्य के व्यवहार में वह (वावशानः) कामना करते हुए आप (मरुद्भिः) पवनों से सूर्य के सदृश (सखिभिः) मित्रों के साथ (नः) हम लोगों के (जातम्) प्रकट और (सुतम्) उत्पन्न (सोमम्) ऐश्वर्य की (पाहि) रक्षा कीजिये और हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसित (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् लोग (यत्) जिससे (महे) बड़े (भराय) पोषण करने योग्य संग्राम के लिये (त्वा) आपको (परि) सब प्रकार (अभूषन्) शोभित करें, तिससे आप हम लोगों को सब प्रकार शोभित करें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य वायुरूप सहाय से सबकी रक्षा करता है, वैसे ही यथार्थवक्ता मित्रों के साथ राजा संपूर्ण राज्य की रक्षा करे और जो मन्त्री और नौकर राज्य के हितकारी होवें, उनका सब काल में सत्कार करें ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।