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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 7

62 Sukta
12 Mantra
3/51/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॑ मरुत्व इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒ यथा॑ शार्या॒ते अपि॑बः सु॒तस्य॑। तव॒ प्रणी॑ती॒ तव॑ शूर॒ शर्म॒न्ना वि॑वासन्ति क॒वयः॑ सुय॒ज्ञाः॥

इन्द्र॑ । म॒रु॒त्वः॒ । इ॒ह । पा॒हि॒ । सोम॑म् । यथा॑ । शा॒र्या॒ते । अपि॑बः । सु॒तस्य॑ । तव॑ । प्रऽनी॑ती । तव॑ । शू॒र॒ । शर्म॑न् । आ । वि॒वा॒स॒न्ति॒ । क॒वयः॑ । सु॒ऽय॒ज्ञाः ॥

Mantra without Swara
इन्द्र मरुत्व इह पाहि सोमं यथा शार्याते अपिबः सुतस्य। तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः॥

इन्द्र। मरुत्वः। इह। पाहि। सोमम्। यथा। शार्याते। अपिबः। सुतस्य। तव। प्रऽनीती। तव। शूर। शर्मन्। आ। विवासन्ति। कवयः। सुऽयज्ञाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के धारण करनेवाले ! आप (इह) इस संसार में (सोमम्) ऐश्वर्य्य करनेवाले की (पाहि) रक्षा कीजिये। और हे (मरुत्वः) उत्तम धनों से युक्त (यथा) जिस प्रकार (शार्य्याते) हिंसा करनेवालों को प्राप्त होनेवालों के इस व्यवहार में (सुतस्य) उत्पन्न को आप (अपिबः) पान कीजिये। हे (शूर) दुष्टों के नाशकर्त्ता जो (सुयज्ञाः) श्रेष्ठ संयुक्त क्रियायें जिनकी वे (कवयः) विद्वान् लोग (तव) आपकी (प्रणीती) उत्तम नीति से और (तव) आपके (शर्मन्) सुखकारक गृह में ऐश्वर्य्यकर्त्ता को (आ, विवासन्ति) प्राप्त होते हैं, उनकी आप रक्षा कीजिये ॥७॥
Essence
हे राजन् ! जैसे आप अपने राज्य ऐश्वर्य्य न्याय और धर्म की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार के आपके मन्त्री और नौकर आदि होवें, उनका सत्कार आपको सदा ही करना चाहिये ॥७॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।