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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 6

62 Sukta
12 Mantra
3/51/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ गिर॑ इन्द्र॒ तुभ्यं॑ स॒त्रा द॑धिरे हरिवो जु॒षस्व॑। बो॒ध्या॒३॒॑पिरव॑सो॒ नूत॑नस्य॒ सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यो॒ वयो॑ धाः॥

तुभ्य॑म् । ब्रह्मा॑णि । गिरः॑ । इ॒न्द्र॒ । तुभ्य॑म् । स॒त्रा । द॒धि॒रे॒ । ह॒रि॒ऽवः॒ । जु॒षस्व॑ । बो॒धि । आ॒पिः । अव॑सः । नूत॑नस्य । सखे॑ । व॒सो॒ इति॑ । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ । वयः॑ । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
तुभ्यं ब्रह्माणि गिर इन्द्र तुभ्यं सत्रा दधिरे हरिवो जुषस्व। बोध्या३पिरवसो नूतनस्य सखे वसो जरितृभ्यो वयो धाः॥

तुभ्यम्। ब्रह्माणि। गिरः। इन्द्र। तुभ्यम्। सत्रा। दधिरे। हरिऽवः। जुषस्व। बोधि। आपिः। अवसः। नूतनस्य। सखे। वसो इति। जरितृऽभ्यः। वयः। धाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्य के धारणकर्त्ता ! जो (गिरः) वाणियाँ (तुभ्यम्) आपके लिये (ब्रह्माणि) धनों को और हे (हरिवः) उत्तम घोड़े आदि से युक्त जो वाणियाँ (तुभ्यम्) आपके लिये (सत्रा) सत्य को (दधिरे) धारण करें उनका आप (जुषस्व) सेवन करो। हे (सखे) मित्र ! (नूतनस्य) नवीन (अवसः) रक्षणादि के (आपिः) व्याप्त हुए आप उनको (बोधि) जानिये हे (वसो) धन को प्राप्त आप (जरितृभ्यः) स्तुतिकर्त्ता विद्वानों के लिये (वयः) जीवन को (धाः) धारण कीजिये ॥६॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि ऐसी वाणी ग्रहण करें और सुनें कि जिससे धनसंग्रह होता है, सत्य की रक्षा की जाती और जीवन बढ़ता है ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।