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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 5

62 Sukta
12 Mantra
3/51/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पू॒र्वीर॑स्य नि॒ष्षिधो॒ मर्त्ये॑षु पु॒रू वसू॑नि पृथि॒वी बि॑भर्ति। इन्द्रा॑य॒ द्याव॒ ओष॑धीरु॒तापो॑ र॒यिं॑ र॑क्षन्ति जी॒रयो॒ वना॑नि॥

पू॒र्वीः । अ॒स्य॒ । निः॒ऽसि॑धः॑ । मर्त्ये॑षु । पु॒रु । वसू॑नि । पृ॒थि॒वी । बि॒भ॒र्ति॒ । इन्द्रा॑य । द्यावः॑ । ओष॑धीः । उ॒त । आपः॑ । र॒यिम् । र॒क्ष॒न्ति॒ । जी॒रयः॑ । वना॑नि ॥

Mantra without Swara
पूर्वीरस्य निष्षिधो मर्त्येषु पुरू वसूनि पृथिवी बिभर्ति। इन्द्राय द्याव ओषधीरुतापो रयिं रक्षन्ति जीरयो वनानि॥

पूर्वीः। अस्य। निःऽसिधः। मर्त्येषु। पुरु। वसूनि। पृथिवी। बिभर्ति। इन्द्राय। द्यावः। ओषधीः। उत। आपः। रयिम्। रक्षन्ति। जीरयः। वनानि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (जीरयः) वृद्ध होनेवाले मनुष्य (अस्य) इस राजा के (मर्त्येषु) मनुष्यों में (पूर्वीः) अनादि काल से सिद्ध (निष्षिधः) अत्यन्त सिद्ध करनेवालियों की (रक्षन्ति) रक्षा करते हैं और (पुरू) बहुत (वसूनि) द्रव्यों को (पृथिवी) भूमि के सदृश जो पुरुष (बिभर्त्ति) धारण करता है (द्यावः) सूर्य्य आदि के प्रकाश (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के लिये (रयिम्) लक्ष्मी और (वनानि) सन्मुख हों सुख जिनसे उनको (उत) भी (आपः) प्राण वा जल जैसे (ओषधीः) सोमलता और ओषधीयों की रक्षा करते हैं वैसे राज्य का (बिभर्त्ति) पोषण करता है, वही राजा होने के योग्य हो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्यों में धन विज्ञान और ओषधि धारण करते, वे ही राजाओं के कर्मचारी होने के योग्य हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।