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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 4

62 Sukta
12 Mantra
3/51/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नृ॒णामु॑ त्वा॒ नृत॑मं गी॒र्भिरु॒क्थैर॒भि प्र वी॒रम॑र्चता स॒बाधः॑। सं सह॑से पुरुमा॒यो जि॑हीते॒ नमो॑ अस्य प्र॒दिव॒ एक॑ ईशे॥

नृ॒णाम् । ऊँ॒ इति॑ । त्वा॒ । नृऽत॑मम् । गीः॒ऽभिः । उ॒क्थैः । अ॒भि । प्र । वी॒रम् । अ॒र्च॒त॒ । स॒ऽबाधः॑ । सम् । सह॑से । पु॒रु॒ऽमा॒यः । जि॒ही॒ते॒ । नमः॑ । अ॒स्य॒ । प्र॒ऽदिवः॑ । एकः॑ । ई॒शे॒ ॥

Mantra without Swara
नृणामु त्वा नृतमं गीर्भिरुक्थैरभि प्र वीरमर्चता सबाधः। सं सहसे पुरुमायो जिहीते नमो अस्य प्रदिव एक ईशे॥

नृणाम्। ऊँ इति। त्वा। नृऽतमम्। गीःऽभिः। उक्थैः। अभि। प्र। वीरम्। अर्चत। सऽबाधः। सम्। सहसे। पुरुऽमायः। जिहीते। नमः। अस्य। प्रऽदिवः। एकः। ईशे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! आप लोग जो (सबाधः) बोध के सहित वर्त्तमान (पुरुमायः) बहुत कार्यों का कर्त्ता (एकः) सहायरहित सेनाधिपति पुरुष (अस्य) इस (प्रदिवः) उत्तम प्रकाश का (ईशे) स्वामी है (सहसे) बल के लिये (नमः) अन्न वा सत्कार को (सम्, जिहीते) प्राप्त होता है उस (वीरम्) राजविद्या और बल से व्याप्त पुरुष का (प्र, अर्चत्) सत्कार करिये। और हे राजन् ! जो (गीर्भिः) वाणियों और (उक्थैः) प्रशंसा के वचनों से (नृणाम्) अग्रणी मनुष्यों के (नृतमम्) अत्यन्त नायक (त्वा) आपका सत्कार करें उनका (उ) ही आप सत्कार करिये ॥४॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि उस ही की प्रशंसा करें कि जो प्रशंसायोग्य कर्मों को करे ॥४॥
Subject
अब प्रजा के प्रशंसा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।