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Rigveda Mandal 3 / Sukta 51 / Mantra 12

62 Sukta
12 Mantra
3/51/12
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र ते॑ अश्नोतु कु॒क्ष्योः प्रेन्द्र॒ ब्रह्म॑णा॒ शिरः॑। प्र बा॒हू शू॑र॒ राध॑से॥

प्र । ते॒ । अ॒श्नो॒तु॒ । कु॒क्ष्योः । प्र । इ॒न्द्र॒ । ब्रह्म॑णा । शिरः॑ । प्र । बा॒हू इति॑ । शू॒र॒ । राध॑से ॥

Mantra without Swara
प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः। प्र बाहू शूर राधसे॥

प्र। ते। अश्नोतु। कुक्ष्योः। प्र। इन्द्र। ब्रह्मणा। शिरः। प्र। बाहू इति। शूर। राधसे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 16 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) राजाओं में श्रेष्ठ जो (ते) आपके (कुक्ष्योः) पेट के आस-पास के भागों में (ब्रह्मणा) धन के साथ रस को (प्र) (अश्नोतु) प्राप्त होवै और हे (शूर) वीर पुरुष ! (ते) आपके (शिरः) श्रेष्ठ अङ्ग मस्तक को (बाहू) भुजाओं को (राधसे) धन के लिये प्राप्त होवे, उसका आप पालन करिये ॥१२॥
Essence
हे राजन् ! वही वस्तु आपको खाना तथा पीना चाहिये कि जो पेट में प्राप्त हो तथा विकृत हो रोगों को उत्पन्न करके बुद्धि का न नाश करे और जिससे निरन्तर आपमें बुद्धि बढ़ कर राज्य और ऐश्वर्य्य बढ़े ॥१२॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के धर्मवर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह इक्यावनवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।