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Rigveda Mandal 3 / Sukta 50 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/50/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मं कामं॑ मन्दया॒ गोभि॒रश्वै॑श्च॒न्द्रव॑ता॒ राध॑सा प॒प्रथ॑श्च। स्व॒र्यवो॑ म॒तिभि॒स्तुभ्यं॒ विप्रा॒ इन्द्रा॑य॒ वाहः॑ कुशि॒कासो॑ अक्रन्॥

इ॒मम् । काम॑म् । म॒न्द॒य॒ । गोभिः॑ । अश्वैः॑ । च॒न्द्रऽव॑ता । राध॑सा । प॒प्रथः॑ । च॒ । स्वः॒ऽयवः॑ । म॒तिऽभिः॑ । तुभ्य॑म् । विप्राः॑ । इन्द्रा॑य । वाहः॑ । कु॒शि॒कासः॑ । अ॒क्र॒न् ॥

Mantra without Swara
इमं कामं मन्दया गोभिरश्वैश्चन्द्रवता राधसा पप्रथश्च। स्वर्यवो मतिभिस्तुभ्यं विप्रा इन्द्राय वाहः कुशिकासो अक्रन्॥

इमम्। कामम्। मन्दय। गोभिः। अश्वैः। चन्द्रऽवता। राधसा। पप्रथः। च। स्वःऽयवः। मतिऽभिः। तुभ्यम्। विप्राः। इन्द्राय। वाहः। कुशिकासः। अक्रन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जो (स्वर्यवः) सुख को प्राप्त कराने (कुशिकासः) संपूर्ण शास्त्रों के सिद्धान्त जानने और (वाहः) प्राप्त करानेवाले (विप्राः) पूर्ण विद्या से युक्त बुद्धिमान् लोग (मतिभिः) मनुष्यों से (इन्द्राय) अत्यन्त धन से युक्त (तुभ्यम्) आपके लिये (इमम्) प्रत्यक्ष (कामम्) मनोरथ को (अक्रन्) करें उन लोगों के इस मनोरथ को (गोभिः) गौ आदि और (अश्वैः) घोड़े आदि और (चन्द्रवता) प्रसिद्ध बहुत सुवर्ण विद्यमान है जिसमें उस (राधसा) धन से आप (पप्रथः) प्रसिद्ध होइये (च) और इनको (मन्दय) पहुँचाइये ॥४॥
Essence
जो श्रेष्ठ पुरुषों के साथ अनुकूलता से वर्त्तमान होकर परस्पर ऐश्वर्य्य से और पशु आदि धन आदिकों से इच्छा को पूर्ण करें, वे सदा सुखी होवें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।