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Rigveda Mandal 3 / Sukta 50 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/50/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ ते॑ सप॒र्यू ज॒वसे॑ युनज्मि॒ ययो॒रनु॑ प्र॒दिवः॑ श्रु॒ष्टिमावः॑। इ॒ह त्वा॑ धेयु॒र्हर॑यः सुशिप्र॒ पिबा॒ त्व१॒॑स्य सुषु॑तस्य॒ चारोः॑॥

आ । ते॒ । स॒प॒र्यू इति॑ । ज॒वसे॑ । यु॒न॒ज्मि॒ । ययोः॑ । अनु॑ । प्र॒ऽदिवः॑ । श्रु॒ष्टिम् । आवः॑ । इ॒ह । त्वा॒ । धे॒युः॒ । हर॑यः । सु॒ऽशि॒प्र॒ । पिब॑ । तु । अ॒स्य । सुऽसु॑तस्य । चारोः॑ ॥

Mantra without Swara
आ ते सपर्यू जवसे युनज्मि ययोरनु प्रदिवः श्रुष्टिमावः। इह त्वा धेयुर्हरयः सुशिप्र पिबा त्व१स्य सुषुतस्य चारोः॥

आ। ते। सपर्यू इति। जवसे। युनज्मि। ययोः। अनु। प्रऽदिवः। श्रुष्टिम्। आवः। इह। त्वा। धेयुः। हरयः। सुऽशिप्र। पिब। तु। अस्य। सुऽसुतस्य। चारोः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 2

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Meaning
हे (सुशिप्र) सुन्दर मुखवाले ! आप (ययोः) जिनके (अनु, प्रदिवः) उत्तम प्रकाशों को (श्रुष्टिम्) शीघ्र (आवः) रक्षा करैं वे (इह) इस संसार में (सपर्य्यू) सेवा करनेवाले (ते) आपके (जवसे) वेग के लिये (आ, युनज्मि) संयुक्त करता हूँ। और जो (हरयः) पुरुषार्थी मनुष्य (त्वा) आपको (धेयुः) धारण करें उनके साथ (तु) शीघ्र (अस्य) इस (सुषुतस्य) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त (चारोः) अतिश्रेष्ठ इस सोमलतारूप ओषधियों के अंश का (पिब) पान कीजिये ॥२॥
Essence
इस संसार में जो लोग जिनके सेवक उन स्वामियों को चाहिये कि उन सेवकों का पोषण करें और सब लोग परस्पर प्रीति से सुख की उन्नति करें ॥२॥
Subject
अब प्रीति के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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