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Rigveda Mandal 3 / Sukta 50 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/50/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रः॒ स्वाहा॑ पिबतु॒ यस्य॒ सोम॑ आ॒गत्या॒ तुम्रो॑ वृष॒भो म॒रुत्वा॑न्। ओरु॒व्यचाः॑ पृणतामे॒भिरन्नै॒रास्य॑ ह॒विस्त॒न्वः१॒॑ काम॑मृध्याः॥

इन्द्रः॑ । स्वाहा॑ । पि॒ब॒तु॒ । यस्य॑ । सोमः॑ । आ॒ऽगत्य॑ । तुम्रः॑ । वृ॒ष॒भः । म॒रुत्वा॑न् । आ । उ॒रु॒ऽव्यचाः॑ । पृ॒ण॒ता॒म् । ए॒भिः । अन्नैः॑ । आ । अ॒स्य॒ । ह॒विः । त॒न्वः॑ । काम॑म् । ऋ॒ध्याः॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रः स्वाहा पिबतु यस्य सोम आगत्या तुम्रो वृषभो मरुत्वान्। ओरुव्यचाः पृणतामेभिरन्नैरास्य हविस्तन्वः१ काममृध्याः॥

इन्द्रः। स्वाहा। पिबतु। यस्य। सोमः। आऽगत्य। तुम्रः। वृषभः। मरुत्वान्। आ। उरुऽव्यचाः। पृणताम्। एभिः। अन्नैः। आ। अस्य। हविः। तन्वः। कामम्। ऋध्याः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जो (सोमः) ऐश्वर्य्यों का समूह (तुम्रः) विघ्नकारियों का हिंसक (वृषभः) बलिष्ठ (मरुत्वान्) उत्तम पुरुषों से युक्त (उरुव्यचाः) बहुत श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त (इन्द्रः) ऐश्वर्य्यों का कर्त्ता (स्वाहा) सत्य क्रिया से (यस्य) जिसका (सोमः) ऐश्वर्य्यों का समूह उस (अस्य) इसके (एभिः) इन वर्त्तमान (अन्नैः) यव आदि अन्नों से (आगत्य) प्राप्त होकर (हविः) ग्रहण करने योग्य वस्तु का (पिबतु) पान कीजिये और (तन्वः) शरीर के (कामम्) मनोरथ को (आ) (पृणताम्) सब प्रकार पूर्ण करके सुख दीजिये और उसको आप (आ, ऋध्याः) सिद्ध कीजिये ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सत्य न्याय से अपने अंश का भोग करके प्रजा के सुख बढ़ाने के लिये अन्याय और दुष्ट पुरुषों का नाश करता है, वह पुरुष समृद्धियुक्त होता है ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले पचासवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा के विषय को कहते हैं।