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Rigveda Mandal 3 / Sukta 5 / Mantra 8

62 Sukta
11 Mantra
3/5/8
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒द्यो जा॒त ओष॑धीभिर्ववक्षे॒ यदी॒ वर्ध॑न्ति प्र॒स्वो॑ घृ॒तेन॑। आप॑इव प्र॒वता॒ शुम्भ॑माना उरु॒ष्यद॒ग्निः पि॒त्रोरु॒पस्थे॑॥

स॒द्यः । जा॒तः । ओष॑धीभिः । व॒व॒क्षे॒ । यदि॑ । वर्ध॑न्ति । प्र॒ऽस्वः॑ । घृ॒तेन॑ । आपः॑ऽइव । प्र॒ऽवता॑ । शुम्भ॑मानाः । उ॒रु॒ष्यत् । अ॒ग्निः । पि॒त्रोः । उ॒पऽस्थे॑ ॥

Mantra without Swara
सद्यो जात ओषधीभिर्ववक्षे यदी वर्धन्ति प्रस्वो घृतेन। आपइव प्रवता शुम्भमाना उरुष्यदग्निः पित्रोरुपस्थे॥

सद्यः। जातः। ओषधीभिः। ववक्षे। यदि। वर्धन्ति। प्रऽस्वः। घृतेन। आपःऽइव। प्रऽवता। शुम्भमानाः। उरुष्यत्। अग्निः। पित्रोः। उपऽस्थे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यदि) जो (प्रस्वः) उत्पन्न होती हैं वे ओषधी (घृतेन) जल से (शुम्भमानाः) सुन्दर शोभित (आपइव) जलों के समान (वर्धन्ति) बढ़ती हैं तो उन (ओषधीभिः) ओषधियों के साथ (प्रवता) नीचला मार्ग है जिसका अर्थात् टपकता हुआ जो घृत उससे जो (सद्यः) शीघ्र (जातः) प्रगट होता हुआ (अग्निः) अग्नि (ववक्षे) रूठे के समान विरुद्ध होता है, जो अग्नि (पित्रोः) माता-पिता स्थानीय आकाश और पृथिवी के (उपस्थे) उस भाग में जिसमें स्थित होते हैं (उरुष्यत्) अपने को बहुत के समान आचरण करता है, उसको जानो ॥८॥
Essence
यदि अग्नि सूर्यरूप से भूमि के जल को खींच कर वर्षा न करावे तो कोई भी ओषधि न हो। जैसे कोई रूठा हुआ किसीको मारता है, वैसे जलता हुआ अग्नि पाये हुए पदार्थों को जला देता है। और जैसे प्रसन्न होता हुआ मित्र मित्र की रक्षा करता है, वैसे युक्ति से सेवन किया हुआ अग्नि पदार्थों की रक्षा करता है ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।