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Rigveda Mandal 3 / Sukta 5 / Mantra 7

62 Sukta
11 Mantra
3/5/7
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ योनि॑म॒ग्निर्घृ॒तव॑न्तमस्थात्पृ॒थुप्र॑गाणमु॒शन्त॑मुशा॒नः। दीद्या॑नः॒ शुचि॑र्ऋ॒ष्वः पा॑व॒कः पुनः॑ पुनर्मा॒तरा॒ नव्य॑सी कः॥

आ । योनि॑म् । अ॒ग्निः । घृ॒तऽव॑न्तम् । अ॒स्था॒त् । पृ॒थुऽप्र॑गानम् । उ॒शन्त॑म् । उशा॒नः । दीद्या॑नः । शुचिः॑ । ऋ॒ष्वः । पा॒व॒कः । पुनः॑ऽपुनः । मा॒तरा॑ । नव्य॑सी॒ इति॑ । क॒रिति॑ कः ॥

Mantra without Swara
आ योनिमग्निर्घृतवन्तमस्थात्पृथुप्रगाणमुशन्तमुशानः। दीद्यानः शुचिर्ऋष्वः पावकः पुनः पुनर्मातरा नव्यसी कः॥

आ। योनिम्। अग्निः। घृतऽवन्तम्। अस्थात्। पृथुऽप्रगानम्। उशन्तम्। उशानः। दीद्यानः। शुचिः। ऋष्वः। पावकः। पुनःऽपुनः। मातरा। नव्यसी इति। करिति कः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 2

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Meaning
जैसे (पावकः) पवित्र करनेवाला (अग्निः) अग्नि (पुनःपुनः) वारंवार (नव्यसी) अतीव नवीन (मातरा) माता-पिता को (कः) प्रसिद्ध करता है वा (घृतवन्तम्) घी जिसमें विद्यमान उस (योनिम्) घर को (आ, अस्थात्) आस्था करता अर्थात् सब प्रकार उसमें स्थिर होता है वैसे (दीद्यानः) देदीप्यमान (शुचिः) पवित्र (ऋष्वः) और प्राप्त होने योग्य जन (पृथुप्रगाणम्) जिसमें विशेष गान वा स्तुति विद्यमान हैं वा जो (उशन्तम्) कामना किया जाता है उसको (उशानः) कामना करता हुआ विद्या और पढ़ानेवाले को माता-पिता के तुल्य मान अपने स्वभावरूपी घर को अच्छा स्थित हो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्युत् रूप अग्नि पृथिवी आदि पदार्थों में स्थिर और सब ओर से अभिव्याप्त होकर किसी से विरुद्ध नहीं होता, वैसे विद्वान् जन किसी से विरुद्ध आचरण न करें, जैसे अग्नि शुद्ध और दूसरों को शुद्ध करनेवाला है, वैसे पवित्र होता हुआ औरों को पवित्र करे ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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