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Rigveda Mandal 3 / Sukta 5 / Mantra 6

62 Sukta
11 Mantra
3/5/6
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒भुश्च॑क्र॒ ईड्यं॒ चारु॒ नाम॒ विश्वा॑नि दे॒वो व॒युना॑नि वि॒द्वान्। स॒सस्य॒ चर्म॑ घृ॒तव॑त्प॒दं वेस्तदिद॒ग्नी र॑क्ष॒त्यप्र॑युच्छन्॥

ऋ॒भुः । च॒क्रे॒ । ईड्य॑म् । चारु॑ । नाम॑ । विश्वा॑नि । दे॒वः । व॒युना॑नि । वि॒द्वान् । स॒मस्य॑ । चर्म॑ । घृ॒तऽव॑त् प॒दम् । वेः । तत् । इत् । अ॒ग्निः । र॒क्ष॒ति॒ । अप्र॑ऽयुच्छन् ॥

Mantra without Swara
ऋभुश्चक्र ईड्यं चारु नाम विश्वानि देवो वयुनानि विद्वान्। ससस्य चर्म घृतवत्पदं वेस्तदिदग्नी रक्षत्यप्रयुच्छन्॥

ऋभुः। चक्रे। ईड्यम्। चारु। नाम। विश्वानि। देवः। वयुनानि। विद्वान्। ससस्य। चर्म। घृतऽवत् पदम्। वेः। तत्। इत्। अग्निः। रक्षति। अप्रऽयुच्छन्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (ऋभुः) बड़ा (देवः) देनेवाला (अप्रयुच्छन्) प्रमाद न करता हुआ (विद्वान्) विद्वान् (ईड्यम्) स्तुति के योग्य कर्म (चारु) सुन्दर (नाम) वाणी वा जल को और (विश्वानि) समस्त (वयुनानि) उत्तम ज्ञानों को (चक्रे) करता है वह (तत्, इत्) उन्हीं को प्राप्त हुआ (अग्निः) अग्नि के समान (वेः) पाये (ससस्य) और सोते हुए मनुष्य के (पदम्) पद और (चर्म) त्वचा की (घृतवत्) घी के तुल्य (रक्षति) रक्षा करता है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्राणाग्नि शरीर की रक्षा करता है, सोते हुए को जगाता है, वैसे अध्यापक और उपदेशक उत्तम शिक्षा को पाये हुए वाणी के समस्त विज्ञानों की प्राप्ति करा कर मनुष्यों को जगाते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।