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Rigveda Mandal 3 / Sukta 5 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/5/2
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रेद्व॒ग्निर्वा॑वृधे॒ स्तोमे॑भिर्गी॒र्भिः स्तो॑तॄ॒णां न॑म॒स्य॑ उ॒क्थैः। पू॒र्वीर्ऋ॒तस्य॑ सं॒दृश॑श्चका॒नः सं दू॒तो अ॑द्यौदु॒षसो॑ विरो॒के॥

प्र । इत् । ऊँ॒ इति॑ । अ॒ग्निः । व॒वृ॒धे॒ । स्तोमे॑भिः । गीः॒ऽभिः । स्तो॒तॄ॒णाम् । न॒म॒स्यः॑ । उ॒क्थैः । पू॒र्वीः । ऋ॒तस्य॑ । स॒म्ऽदृशः॑ । च॒का॒नः । सम् । दू॒तः । अ॒द्यौ॒त् । उ॒षसः॑ । वि॒ऽरो॒के ॥

Mantra without Swara
प्रेद्वग्निर्वावृधे स्तोमेभिर्गीर्भिः स्तोतॄणां नमस्य उक्थैः। पूर्वीर्ऋतस्य संदृशश्चकानः सं दूतो अद्यौदुषसो विरोके॥

प्र। इत्। ऊँ इति। अग्निः। ववृधे। स्तोमेभिः। गीःऽभिः। स्तोतॄणाम्। नमस्यः। उक्थैः। पूर्वीः। ऋतस्य। सम्ऽदृशः। चकानः। सम्। दूतः। अद्यौत्। उषसः। विऽरोके॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (दूतः) परिताप देनेवाला (अग्निः) अग्नि इन्धनों से (प्र, ववृधे) अच्छे प्रकार बढ़ता है वैसे (स्तोतॄणाम्) समस्त विद्या प्रशंसा करनेवालों के (स्तोमेभिः) उन व्यवहारों से जिनसे सब विद्याओं की स्तुति करते हैं (गीर्भिः) तथा सुशिक्षित वाणियों से (उक्थैः) और सब विद्याओं का सम्बन्ध जिनमें करते हैं उन व्यवहारों से (नमस्यः) जो सत्कार करने योग्य है वह बढ़ता है जैसे अग्नि (विरोके) सब ओर से जिनमें प्रीति है उस व्यवहार के वा प्रकाश के निमित्त (उषसः) प्रभात समयों को (अद्यौत्) प्रकाशित करता है वैसे (संदृशः) अच्छे प्रकार देखने को (ऋतस्य) सत्यसम्बन्धी (पूर्वीः) पूर्ण बहुत विद्या की (चकानः) कामना करता हुआ (इत्, उ) ही तर्क-वितर्क के साथ विद्वान् (सम्) अच्छे प्रकार प्रकाशित होता है ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इन्धन और घृतादिकों से अग्नि प्रवृद्ध हो कर प्रकाशित होता, वैसे ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यासादिकों से मनुष्यों के आत्मा ज्ञानवृद्ध हो कर सनातन विद्या सबको देकर पूज्यतम होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।