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Rigveda Mandal 3 / Sukta 49 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/49/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ध॒र्ता दि॒वो रज॑सस्पृ॒ष्ट ऊ॒र्ध्वो रथो॒ न वा॒युर्वसु॑भिर्नि॒युत्वा॑न्। क्ष॒पां व॒स्ता ज॑नि॒ता सूर्य॑स्य॒ विभ॑क्ता भा॒गं धि॒षणे॑व॒ वाज॑म्॥

ध॒र्ता । दि॒वः । रज॑सः । पृ॒ष्टः । ऊ॒र्ध्वः । रथः॑ । न । वा॒युः । वसु॑ऽभिः । नि॒युत्वा॑न् । क्ष॒पाम् । व॒स्ता । ज॒नि॒ता । सूर्य॑स्य । विऽभ॑क्ता । भा॒गम् । धि॒षणा॑ऽइव । वाज॑म् ॥

Mantra without Swara
धर्ता दिवो रजसस्पृष्ट ऊर्ध्वो रथो न वायुर्वसुभिर्नियुत्वान्। क्षपां वस्ता जनिता सूर्यस्य विभक्ता भागं धिषणेव वाजम्॥

धर्ता। दिवः। रजसः। पृष्टः। ऊर्ध्वः। रथः। न। वायुः। वसुऽभिः। नियुत्वान्। क्षपाम्। वस्ता। जनिता। सूर्यस्य। विऽभक्ता। भागम्। धिषणाऽइव। वाजम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जो (दिवः) प्रकाशस्वरूप (सूर्यस्य) सूर्य (रजसः) लोकों के समूह का (जनिता) उत्पन्न करने (धर्त्ता) धारण करनेवाला (पृष्टः) पूछने योग्य (ऊर्ध्वः) उत्तम (रथः) सुन्दर वाहनके (न) तुल्य (वसुभिः) सम्पूर्ण लोकों से (वायुः) पवन के सदृश बलवान् (क्षपाम्) रात्रि को (वस्ता) आच्छादन करनेवाला और (धिषणेव) अन्तरिक्ष और भूमि के सदृश (वाजम्) घोड़े आदि (भागम्) अंश का (विभक्ता) विभाग करने और (नियुत्वान्) नियम करनेवाला है, उसको परमात्मा के सदृश राजा मानो ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो राजा परमेश्वर के सदृश प्रजाओं में वर्त्तमान है, उसीकी निरन्तर सेवा करो ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।