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Rigveda Mandal 3 / Sukta 48 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/48/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒ग्रस्तु॑रा॒षाळ॒भिभू॑त्योजा यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः। त्वष्टा॑र॒मिन्द्रो॑ ज॒नुषा॑भि॒भूया॒मुष्या॒ सोम॑मपिबच्च॒मूषु॑॥

उ॒ग्रः । तु॒रा॒षाट् । अ॒भिभू॑तिऽओजाः । य॒था॒ऽव॒शम् । त॒न्व॑म् । च॒क्रे॒ । ए॒षः । त्वष्टा॑रम् । इन्द्रः॑ । ज॒नुषा॑ । अ॒भि॒ऽभूय॑ । आ॒ऽमुष्य॑ । सोम॑म् । अ॒पि॒ब॒त् । च॒मूषु॑ ॥

Mantra without Swara
उग्रस्तुराषाळभिभूत्योजा यथावशं तन्वं चक्र एषः। त्वष्टारमिन्द्रो जनुषाभिभूयामुष्या सोममपिबच्चमूषु॥

उग्रः। तुराषाट्। अभिभूतिऽओजाः। यथाऽवशम्। तन्वम्। चक्रे। एषः। त्वष्टारम्। इन्द्रः। जनुषा। अभिऽभूय। आऽमुष्य। सोमम्। अपिबत्। चमूषु॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 4

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Meaning
जो (एषः) यह (चमूषु) भक्षण करनेवाली सेनाओं में (सोमम्) ओषधियों के रस की (आमुष्य) चोरी करके (अपिबत्) पीवे उस (त्वष्टारम्) तेजस्वी और शत्रुओं का (अभिभूय) तिरस्कार करके (जनुषा) जन्म से (उग्रः) तेजस्वी (तुराषाट्) शीघ्रकारियों को सहनेवाला (अभिभूत्योजाः) शत्रुओं के तिरस्कार करनेवाले पराक्रम से युक्त (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यवाला पुरुष (यथावशम्) यथासामर्थ्य (तन्वम्) शरीर को (चक्रे) करता है, वह राज्य करने के योग्य होवे ॥४॥
Essence
जो विद्वान् धार्मिक राजा जन हैं, वे चोर आदि दुष्ट जनों का तिरस्कार और मादक द्रव्य अर्थात् उन्मत्तता करनेवाले द्रव्यों के सेवनकर्त्ताओं का दण्ड करके और अपने आप अव्यसनी होकर प्रजाओं के पालन करने को समर्थ होवें, वे ही राज्य की वृद्धि करने के योग्य होवें ॥४॥
Subject
अब प्रजा के पालन का विषय अगले मन्त्र में कहते हैं।

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