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Rigveda Mandal 3 / Sukta 48 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/48/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यज्जाय॑था॒स्तदह॑रस्य॒ कामें॒ऽशोः पी॒यूष॑मपिबो गिरि॒ष्ठाम्। तं ते॑ मा॒ता परि॒ योषा॒ जनि॑त्री म॒हः पि॒तुर्दम॒ आसि॑ञ्च॒दग्रे॑॥

यत् । जाय॑थाः । तत् । अहः॑ । अ॒स्य॒ । कामे॑ । अं॒शोः । पी॒यूष॑म् । अ॒पि॒बः॒ । गि॒रि॒ऽस्थाम् । तम् । ते॒ । मा॒ता । परि॑ । योषा॑ । जनि॑त्री । म॒हः । पि॒तुः । दमे॑ । आ । अ॒सि॒ञ्च॒त् । अग्रे॑ ॥

Mantra without Swara
यज्जायथास्तदहरस्य कामेंऽशोः पीयूषमपिबो गिरिष्ठाम्। तं ते माता परि योषा जनित्री महः पितुर्दम आसिञ्चदग्रे॥

यत्। जायथाः। तत्। अहः। अस्य। कामे। अंशोः। पीयूषम्। अपिबः। गिरिऽस्थाम्। तम्। ते। माता। परि। योषा। जनित्री। महः। पितुः। दमे। आ। असिञ्चत्। अग्रे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! आप (यत्) जिस (अहः) दिन (जायथाः) उत्पन्न हुए (तत्) उस दिन की (कामे) कामना में (अस्य) इस (अंशोः) प्राप्त हुए भाग के (गिरिष्ठाम्) मेघ में विद्यमान (पीयूषम्) अमृतरूप रस को (ते) आपके पिता (अपिबः) पान करें (तम्) उसको आपके (पितुः) पालक और उत्पादक पिता की (योषा) स्त्री आपकी (जनित्री) उत्पन्न करनेवाली (माता) माता (अग्रे) पहिले (दमे) घर में (महः) बड़े को (परि, आ, असिञ्चत्) चारों ओर से सींचता है ॥२॥
Essence
जब स्त्री और पुरुष गर्भ को धारण करें तब दुष्ट अन्न पान आदि का सेवन त्याग श्रेष्ठ अन्न पान गर्भधारण और सन्तान उत्पन्न करके फिर उसका भी इसी प्रकार पालन और वृद्धि करे, जो कि राजा होने को योग्य हो ॥२॥
Subject
अब सन्तान की उत्पत्ति के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।