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Rigveda Mandal 3 / Sukta 48 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/48/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒द्यो ह॑ जा॒तो वृ॑ष॒भः क॒नीनः॒ प्रभ॑र्तुमाव॒दन्ध॑सः सु॒तस्य॑। सा॒धोः पि॑ब प्रतिका॒मं यथा॑ ते॒ रसा॑शिरः प्रथ॒मं सो॒म्यस्य॑॥

स॒द्यः । ह॒ । ज॒तः । वृ॒ष॒भः । क॒नीनः॑ । प्रऽभ॑र्तुम् । आ॒व॒त् । अन्ध॑सः । सु॒तस्य॑ । सा॒धोः । पि॒ब॒ । प्र॒ति॒ऽका॒मम् । यथा॑ । ते॒ । रस॑ऽआशिरः । प्र॒थ॒मम् । सो॒म्यस्य॑ ॥

Mantra without Swara
सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः प्रभर्तुमावदन्धसः सुतस्य। साधोः पिब प्रतिकामं यथा ते रसाशिरः प्रथमं सोम्यस्य॥

सद्यः। ह। जातः। वृषभः। कनीनः। प्रऽभर्तुम्। आवत्। अन्धसः। सुतस्य। साधोः। पिब। प्रतिऽकामम्। यथा। ते। रसऽआशिरः। प्रथमम्। सोम्यस्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 12 Mantra » 1

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Meaning
हे राजन् ! (यथा) जैसे (सद्यः) शीघ्र (जातः) उत्पन्न हुआ (वृषभः) वृष्टि करनेवाला (कनीनः) प्रकाशवान् (रसाशिरः) रसों का भोजन करनेवाला सूर्य्य (अन्धसः) अन्न के (सुतस्य) उत्तम प्रकार संस्कार युक्त (सोम्यस्य) ऐश्वर्य्य में उत्पन्न का (प्रथमम्) प्रथम (आवत्) रक्षा करे उस प्रकार के आप (प्रतिकामम्) कामना-कामना के प्रति ओषधियों के रस को (पिब) पान करो और इस प्रकार के (साधोः) उत्तम मार्गों में वर्त्तमान (ते) आपका (ह) निश्चय से प्रजाओं को (प्रभर्त्तुम्) प्रकर्षता से धारण करने को सामर्थ्य होवे ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यों ! जैसे सूर्य्य आदि पदार्थ अपने प्रतापों और ईश्वर के नियोग से सब पदार्थों की रक्षा करके दोषों का नाश करते हैं, वैसे ही साधु पुरुषों की रक्षा करके दुष्ट पुरुषों का नाश करें ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा के विषय को कहते हैं।

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