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Rigveda Mandal 3 / Sukta 47 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/47/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒रुत्व॑न्तं वृष॒भं वा॑वृधा॒नमक॑वारिं दि॒व्यं शा॒समिन्द्र॑म्। वि॒श्वा॒साह॒मव॑से॒ नूत॑नायो॒ग्रं स॑हो॒दामि॒ह तं हु॑वेम॥

म॒रुत्व॑न्तम् । वृष॒भम् । व॒वृ॒धा॒नम् । अक॑वऽअरिम् । दि॒व्यम् । शा॒सम् । इन्द्र॑म् । वि॒श्वा॒ऽसहम् । अव॑से । नूत॑नाय । उ॒ग्रम् । स॒हः॒ऽदाम् । इ॒ह । तम् । हु॒वे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यं शासमिन्द्रम्। विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह तं हुवेम॥

मरुत्वन्तम्। वृषभम्। ववृधानम्। अकवऽअरिम्। दिव्यम्। शासम्। इन्द्रम्। विश्वाऽसहम्। अवसे। नूतनाय। उग्रम्। सहःऽदाम्। इह। तम्। हुवेम॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वान् पुरुषो ! आप लोग (इह) इस राज्यव्यवहार में (नूतनाय) नवीन (अवसे) रक्षण आदि के लिये जिस (मरुत्वन्तम्) प्रशंसा करने योग्य मनुष्य हों जिसके उस और (वृषभम्) बलवाले और (वावृधानम्) बढ़ने वा बढ़ानेवाले (अकवारिम्) शत्रुओं से रहित (दिव्यम्) शुद्ध गुण-कर्म और स्वभाव से युक्त (विश्वासाहम्) सबको सहने और (उग्रम्) दुष्टों के नाश करने (सहोदाम्) बल के देने और (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले (शासम्) शासन करनेवाले की प्रशंसा करो (तम्) उसकी हम लोग (हुवेम) प्रशंसा करें ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि उसीको अपना राजा करें कि जिसमें सम्पूर्ण राजा के धर्म अङ्ग और उपाङ्ग सहित वर्त्तमान हैं ॥५॥ इस सूक्त में राजा और सूर्य्य के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह सैंतालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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