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Rigveda Mandal 3 / Sukta 47 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/47/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये त्वा॑हि॒हत्ये॑ मघव॒न्नव॑र्ध॒न्ये शा॑म्ब॒रे ह॑रिवो॒ ये गवि॑ष्टौ। ये त्वा॑ नू॒नम॑नु॒मद॑न्ति॒ विप्राः॒ पिबे॑न्द्र॒ सोमं॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॑॥

ये । त्वा॒ । अ॒हि॒ऽहत्ये॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । अव॑र्धन् । ये । शा॒म्ब॒रे । ह॒रि॒वः॒ । ये । गोऽइ॑ष्टौ । ये । त्वा॒ । न्न॒म् । अ॒नु॒ऽमद॑न्ति । विप्राः॑ । पिब॑ । इ॒न्द्र॒ । सोम॑म् । सऽग॑णः । म॒रुत्ऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
ये त्वाहिहत्ये मघवन्नवर्धन्ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ। ये त्वा नूनमनुमदन्ति विप्राः पिबेन्द्र सोमं सगणो मरुद्भिः॥

ये। त्वा। अहिऽहत्ये। मघऽवन्। अवर्धन्। ये। शाम्बरे। हरिवः। ये। गोऽइष्टौ। ये। त्वा। न्नम्। अनुऽमदन्ति। विप्राः। पिब। इन्द्र। सोमम्। सऽगणः। मरुत्ऽभिः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हरिवः) उत्तम घोड़ों से युक्त (मघवन्) श्रेष्ठ बहुत धनोंवाले (इन्द्र) ऐश्वर्य के कर्त्ता ! (ये) जो (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (त्वा) आपको (मरुद्भिः) पवनों के सदृश अपने मित्रों के साथ सूर्य (अहिहत्ये) मेघ का नाश हो जिसमें ऐसे (शाम्बरे) मेघसम्बन्धी संग्राम में जैसे वैसे (अवर्धन्) वृद्धि करें और (ये) जो (गविष्टौ) किरणों के समूह में आपकी वृद्धि करें (ये) जो युद्ध में (नूनम्) निश्चित (अनु, मदन्ति) अनुकूलता से आनन्द देते हैं उन पवनों के सदृश मित्रों के और (सगणः) वीर पुरुषों के सहित (सोमम्) ओषधियों से उत्पन्न हुए घृत दुग्ध आदि रसों का (पिब) पान कीजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नहीं बढ़े हुए मेघ को सूर्य बढ़ाय के और बढ़े हुए का नाश करता है, वैसे ही धार्मिक राजा आदि पुरुष धार्मिक शान्त पुरुषों की रक्षा और दुष्ट पुरुषों का नाश कर स्वयं प्रसन्न होकर प्रजाओं को प्रसन्न करें ॥४॥
Subject
फिर राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।