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Rigveda Mandal 3 / Sukta 47 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/47/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒जोषा॑ इन्द्र॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॒ सोमं॑ पिब वृत्र॒हा शू॑र वि॒द्वान्। ज॒हि शत्रूँ॒रप॒ मृधो॑ नुद॒स्वाथाभ॑यं कृणुहि वि॒श्वतो॑ नः॥

स॒ऽजोषाः॑ । इ॒न्द्र॒ । सऽग॑णः । म॒रुत्ऽभिः॑ । सोम॑म् । पि॒ब॒ । वृ॒त्र॒ऽहा । शू॒र॒ । वि॒द्वान् । ज॒हि । शत्रू॑न् । अप॑ । मृधः॑ । नु॒द॒स्व॒ । अथ॑ । अभ॑यम् । कृ॒णु॒हि॒ । वि॒श्वतः॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
सजोषा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्। जहि शत्रूँरप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः॥

सऽजोषाः। इन्द्र। सऽगणः। मरुत्ऽभिः। सोमम्। पिब। वृत्रऽहा। शूर। विद्वान्। जहि। शत्रून्। अप। मृधः। नुदस्व। अथ। अभयम्। कृणुहि। विश्वतः। नः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) शत्रुओं के नाशकर्त्ता (इन्द्र) ऐश्वर्य्य से युक्त करनेवाले ! (मरुद्भिः) पवनों के सदृश वीर पुरुषों के और (सगणः) गणों के सहित वर्त्तमान (वृत्रहा) मेघ का नाशकर्त्ता सूर्य्य जैसे वैसे (सजोषाः) तुल्य प्रीति का सेवन करनेवाला गणों के सहित वर्त्तमान होकर और पवनों के सदृश वीर पुरुषों के सहित (विद्वान्) सकल विद्याओं का जाननेवाला पुरुष (सोमम्) सोमलता के रस को (पिब) पीजिये और (शत्रून्) शत्रुओं को (अप, जहि) देश से बाहर करके नष्ट करिये (मृधः) सङ्ग्रामों की (नुदस्व) प्रेरणा अर्थात् प्रवृत्ति का उत्साह दीजिये (अथ) उसके अनन्तर (विश्वतः) सब ओर से (नः) हम लोगों को (अभयम्) भयरहित (कृणुहि) कीजिये ॥२॥
Essence
जो राजा आदि मनुष्य परस्पर मित्र होकर नियमित भोजन विहार ब्रह्मचर्य्य जितेन्द्रिय होने आदि से पूर्ण शरीर आत्मा के बलवाले हो शत्रुओं को नाश कर और संग्रामों को जीतकर प्रजाओं में सब प्रकार भयरहित करते हैं, वे ही सर्वत्र भयरहित सुख को प्राप्त होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।