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Rigveda Mandal 3 / Sukta 46 / Mantra 2

62 Sukta
5 Mantra
3/46/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हाँ अ॑सि महिष॒ वृष्ण्ये॑भिर्धन॒स्पृदु॑ग्र॒ सह॑मानो अ॒न्यान्। एको॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॒ स यो॒धया॑ च क्ष॒यया॑ च॒ जना॑न्॥

म॒हान् । अ॒सि॒ । म॒हि॒ष॒ । वृष्ण्ये॑भिः । ध॒न॒ऽस्पृत् । उ॒ग्र॒ । सह॑मानः । अ॒न्यान् । एकः॑ । विश्व॑स्य । भुव॑नस्य । राजा॑ । सः । यो॒धया॑ । च॒ । क्ष॒यया॑ । च॒ । जना॑न् ॥

Mantra without Swara
महाँ असि महिष वृष्ण्येभिर्धनस्पृदुग्र सहमानो अन्यान्। एको विश्वस्य भुवनस्य राजा स योधया च क्षयया च जनान्॥

महान्। असि। महिष। वृष्ण्येभिः। धनऽस्पृत्। उग्र। सहमानः। अन्यान्। एकः। विश्वस्य। भुवनस्य। राजा। सः। योधया। च। क्षयया। च। जनान्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (महिष) अत्यन्त आदर करने योग्य ! (उग्र) बल आदिकों से युक्त और (राजन्) प्रकाशित जिससे आप (वृष्ण्येभिः) बलवान् पुरुषों में उत्पन्न गुणों के साथ (महान्) श्रेष्ठ गुणों से युक्त और (धनस्पृत्) धन के सेवक (एकः) सहायरहित (अन्यान्) शत्रुओं को (सहमानः) सहते हुए (विश्वस्य) सम्पूर्ण (भुवनस्य) प्राणियों के निवास के स्थान के श्रेष्ठगुणों से युक्त (राजा) (असि) हैं (सः) वह आप (जनान्) प्रसिद्ध वीरों को (योधय) लड़ाइये शत्रुओं को (क्षयय) पराजय को पहुँचाइये (च) और सज्जनों को अपने देश में बसाइये ॥२॥
Essence
जो लोग शरीर और आत्मा का पूर्ण बल करके शत्रुओं को निवारण करते और सज्जनों का सत्कार करके आनन्द देते हैं, वे श्रेष्ठ होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।