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Rigveda Mandal 3 / Sukta 46 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/46/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒ध्मस्य॑ ते वृष॒भस्य॑ स्व॒राज॑ उ॒ग्रस्य॒ यूनः॒ स्थवि॑रस्य॒ घृष्वेः॑। अजू॑र्यतो व॒ज्रिणो॑ वी॒र्या॒३॒॑णीन्द्र॑ श्रु॒तस्य॑ मह॒तो म॒हानि॑॥

यु॒ध्मस्य॑ । ते॒ । वृ॒ष॒भस्य॑ । स्व॒ऽराजः॑ । उ॒ग्रस्य॑ । यूनः॑ । स्थवि॑रस्य । घृष्वेः॑ । अजू॑र्यतः । व॒ज्रिणः॑ । वी॒र्या॑णि । इन्द्र॑ । श्रु॒तस्य॑ । म॒ह॒तः । म॒हानि॑ ॥

Mantra without Swara
युध्मस्य ते वृषभस्य स्वराज उग्रस्य यूनः स्थविरस्य घृष्वेः। अजूर्यतो वज्रिणो वीर्या३णीन्द्र श्रुतस्य महतो महानि॥

युध्मस्य। ते। वृषभस्य। स्वऽराजः। उग्रस्य। यूनः। स्थविरस्य। घृष्वेः। अजूर्यतः। वज्रिणः। वीर्याणि। इन्द्र। श्रुतस्य। महतः। महानि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के दाता ! जिस (युध्मस्य) युद्ध करने और (स्वराजः) अपने से प्रकाशित (वृषभस्य) बलवाले (उग्रस्य) तेजस्वी स्वभाव और (यूनः) यौवन अवस्था को प्राप्त पुरुष तथा (स्थविरस्य) वृद्धावस्थायुक्त पुरुष के और (घृष्वेः) शत्रुओं को घसीटनेवाले (अजूर्य्यतः) शरीर की शिथिलता से रहित और (वज्रिणः) बहुत प्रकार के शस्त्रों से युक्त (महतः) सेवा करने योग्य (श्रुतस्य) प्रसिद्ध (ते) आपके जो (महानि) श्रेष्ठ (वीर्य्याणि) वीर पुरुषों के कर्म हैं, उनसे युक्त आप हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हैं ॥१॥
Essence
जो संपूर्ण लक्षणों से युक्त युवा वा वृद्ध भी राजा हो, वैसे ही अपने प्रयत्न से अपने सामर्थ्य का बढ़ानेवाला होवे ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले छियालीसवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा कैसा हो, इस विषय को कहते हैं।