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Rigveda Mandal 3 / Sukta 45 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/45/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ न॒स्तुजं॑ र॒यिं भ॒रांशं॒ न प्र॑तिजान॒ते। वृ॒क्षं प॒क्वं फल॑म॒ङ्कीव॑ धूनु॒हीन्द्र॑ सं॒पार॑णं॒ वसु॑॥

आ । नः॒ । तुज॑म् । र॒यिम् । भ॒र॒ । अंश॑म् । न । प्र॒ति॒ऽजा॒न॒ते । वृ॒क्षम् । प॒क्वम् । फल॑म् । अ॒ङ्कीऽइ॑व । धू॒नु॒हि॒ । इन्द्र॑ । स॒म्ऽपार॑णम् । वसु॑ ॥

Mantra without Swara
आ नस्तुजं रयिं भरांशं न प्रतिजानते। वृक्षं पक्वं फलमङ्कीव धूनुहीन्द्र संपारणं वसु॥

आ। नः। तुजम्। रयिम्। भर। अंशम्। न। प्रतिऽजानते। वृक्षम्। पक्वम्। फलम्। अङ्कीऽइव। धूनुहि। इन्द्र। सम्ऽपारणम्। वसु॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 9 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) धन के दाता ! आप (अंशम्) भाग के (न) तुल्य (नः) हमलोगों के लिये (प्रतिजानते) प्रतिज्ञा से व्यवहार के सिद्ध करनेवाले के लिये और (तुजम्) ग्रहण करने के योग्य (रयिम्) धन को (आ) सब ओर से (भर) दीजिये (वृक्षम्) वृक्ष को और (पक्वम्) पाकयुक्त (फलम्) फल को (अङ्कीव) अंकुश धारण किये हुए के सदृश (सम्पारणम्) उत्तम प्रकार दुःख के पार जाता है जिससे ऐसे (वसु) धन को (धूनुहि) कम्पाइये अर्थात् भेजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही धार्मिक पुरुष हैं, जो अन्य लोगों के सुख के लिये लक्ष्मी धारण करके औरों के दुःख नाश करनेवाले होवें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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