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Rigveda Mandal 3 / Sukta 44 / Mantra 5

62 Sukta
5 Mantra
3/44/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इन्द्रो॑ ह॒र्यन्त॒मर्जु॑नं॒ वज्रं॑ शु॒क्रैर॒भीवृ॑तम्। अपा॑वृणो॒द्धरि॑भि॒रद्रि॑भिः सु॒तमुद्गा हरि॑भिराजत॥

इन्द्रः॑ । ह॒र्यन्त॑म् । अर्जु॑नम् । वज्र॑म् । शु॒क्रैः । अ॒भिऽवृ॑तम् । अप॑ । अ॒वृ॒णो॒त् । हरि॑ऽभिः । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तम् । उत् । गाः । हरि॑ऽभिः । आ॒ज॒त॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो हर्यन्तमर्जुनं वज्रं शुक्रैरभीवृतम्। अपावृणोद्धरिभिरद्रिभिः सुतमुद्गा हरिभिराजत॥

इन्द्रः। हर्यन्तम्। अर्जुनम्। वज्रम्। शुक्रैः। अभिऽवृतम्। अप। अवृणोत्। हरिऽभिः। अद्रिऽभिः। सुतम्। उत्। गाः। हरिऽभिः। आजत॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् लोगो ! जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य (शुक्रैः) शीघ्रता करनेवाले गुणों से (अभीवृतम्) सब ओर से युक्त (अर्जुनम्) रूप और (वज्रम्) किरणों के समूह की (हर्य्यन्तम्) कामना करते हुए (हरिभिः) हरनेवाली किरणों और (अद्रिभिः) मेघों से (सुतम्) सिद्ध हुए पदार्थ को (अप, अवृणोत्) दूर करता है वैसे (हरिभिः) मनुष्यों के साथ राजा (गाः) पृथिवियों के तुल्य और पदार्थों को (उत्, आजत) फेंकता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य के सदृश विद्या नम्रता सेना और धन आदि का प्रकाश और अविद्या आदि की निवृत्ति कर जिसका उत्तम सहाय उस राजा के साथ सलाह करके राज्य का पालन करते हैं, वे पूर्ण मनोरथवाले होते हैं ॥५॥ इस सूक्त में सूर्य्य बिजुली वायु और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥५॥ यह चवालीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।