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Rigveda Mandal 3 / Sukta 44 / Mantra 4

62 Sukta
5 Mantra
3/44/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ज॒ज्ञा॒नो हरि॑तो॒ वृषा॒ विश्व॒मा भा॑ति रोच॒नम्। हर्य॑श्वो॒ हरि॑तं धत्त॒ आयु॑ध॒मा वज्रं॑ बा॒ह्वोर्हरि॑म्॥

ज॒ज्ञा॒नः । हरि॑तः । वृषा॑ । विश्व॑म् । आ । भा॒ति॒ । रो॒च॒नम् । हरि॑ऽअश्वः । हरि॑तम् । ध॒त्ते॒ । आयु॑धम् । आ । वज्र॑म् । बा॒ह्वोः । हरि॑म् ॥

Mantra without Swara
जज्ञानो हरितो वृषा विश्वमा भाति रोचनम्। हर्यश्वो हरितं धत्त आयुधमा वज्रं बाह्वोर्हरिम्॥

जज्ञानः। हरितः। वृषा। विश्वम्। आ। भाति। रोचनम्। हरिऽअश्वः। हरितम्। धत्ते। आयुधम्। आ। वज्रम्। बाह्वोः। हरिम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वान् लोगो ! जो (जज्ञानः) उत्पन्न होता हुआ (हरितः) हरित आदि वर्णों से युक्त (हर्यश्वः) कामना करते हुए शीघ्र चलनेवाले गुण हैं जिस बिजुली रूप के वह (वृषा) वृष्टिकारक (हरितम्) कामना करने योग्य (रोचनम्) और सब ओर से जिसमें प्रीति करते हैं ऐसे (विश्वम्) संपूर्ण लोक को (बाह्वोः) भुजाओं के (हरितम्) हरनेवाले (वज्रम्) शस्त्रों के सदृश किरणों के समूह को (प्र, आ, धत्ते) धारण करता और (आ, भाति) प्रकाशित होता है, उसको जानकर उपयोग करो ॥४॥
Essence
विद्वान् लोग जैसे प्रसिद्ध सूर्य्य संपूर्ण जगत् को प्रकाशित करके आप प्रकाशित होता है, वैसे ही सद्विद्या के उपदेश से धर्म का प्रकाश करावें ॥४॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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