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Rigveda Mandal 3 / Sukta 44 / Mantra 1

62 Sukta
5 Mantra
3/44/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒यं ते॑ अस्तु हर्य॒तः सोम॒ आ हरि॑भिः सु॒तः। जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ हरि॑भिर्न॒ आ ग॒ह्या ति॑ष्ठ॒ हरि॑तं॒ रथ॑म्॥

अ॒यम् । ते॒ । अ॒स्तु॒ । ह॒र्य॒तः । सोमः॑ । आ । हरि॑ऽभिः । सु॒तः । जु॒षा॒णः । इ॒न्द्र॒ । हरि॑ऽभिः । नः॒ । आ । ग॒हि॒ । आ । ति॒ष्ठ॒ । हरि॑तम् । रथ॑म् ॥

Mantra without Swara
अयं ते अस्तु हर्यतः सोम आ हरिभिः सुतः। जुषाण इन्द्र हरिभिर्न आ गह्या तिष्ठ हरितं रथम्॥

अयम्। ते। अस्तु। हर्यतः। सोमः। आ। हरिऽभिः। सुतः। जुषाणः। इन्द्र। हरिऽभिः। नः। आ। गहि। आ। तिष्ठ। हरितम्। रथम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 8 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले ! (हर्यतः) कामना करते हुए (ते) आपके (हरिभिः) घोड़ों के सदृश साधनों से जो (अयम्) यह (सोमः) ऐश्वर्य्यों का समूह (सुतः) प्राप्त हुआ (अस्तु) हो उसका (जुषाणः) सेवन करता हुआ (हरिभिः) ले चलनेवाले घोड़ों से (हरितम्) अग्नि आदिकों से चलाये गये (रथम्) मनोहर यान पर (आ, तिष्ठ) स्थिर हूजिये इससे (नः) हम लोगों को (आ, गहि) प्राप्त हूजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही लोग दयालु हैं कि जो अन्य जनों के ऐश्वर्य्य की वृद्धि की इच्छा करें और ऐश्वर्य्यवालों को आते हुए देख के प्रसन्न होवें ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले चवालीसवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में सूर्य्य के विषय को कहते हैं।