Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 43 / Mantra 7

62 Sukta
8 Mantra
3/43/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ पिब॒ वृष॑धूतस्य॒ वृष्ण॒ आ यं ते॑ श्ये॒न उ॑श॒ते ज॒भार॑। यस्य॒ मदे॑ च्या॒वय॑सि॒ प्र कृ॒ष्टीर्यस्य॒ मदे॒ अप॑ गो॒त्रा व॒वर्थ॑॥

इन्द्र॑ । पिब॑ । वृष॑ऽधूतस्य । वृष्णः॑ । आ । यम् । ते॒ । श्ये॒नः । उ॒श॒ते । ज॒भार॑ । यस्य॑ । मदे॑ । च्या॒वय॑सि । प्र । कृ॒ष्टीः । यस्य॑ । मदे॑ । अप॑ । गो॒त्रा । व॒वर्थ॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्ण आ यं ते श्येन उशते जभार। यस्य मदे च्यावयसि प्र कृष्टीर्यस्य मदे अप गोत्रा ववर्थ॥

इन्द्र। पिब। वृषऽधूतस्य। वृष्णः। आ। यम्। ते। श्येनः। उशते। जभार। यस्य। मदे। च्यावयसि। प्र। कृष्टीः। यस्य। मदे। अप। गोत्रा। ववर्थ॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 7

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विशेष ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! आप (वृषधूतस्य) बलिष्ठ पदार्थों के कँपानेवाले (वृष्णः) बलिष्ठ पदार्थ के रस का (पिब) पान करो (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश (यम्) जिसकी (उशते) कामना करनेवाले (ते) आपके लिये जिसको (आ, जभार) धारण करता है (यस्य) जिसके (मदे) आनन्द में आप (कृष्टीः) मनुष्यों को (प्र, च्यावयसि) प्राप्त कराते हैं और (यस्य) जिसके (मदे) आनन्द के निमित्त (गोत्रा) पृथिवी (अप, ववर्थ) वर्त्तमान है, उसकी अपने तुल्य सेवा करो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो श्येन पक्षी के सदृश शीघ्र चलने और सबके सुख की कामना करनेवाले पुरुष मनुष्यों को सुख देते हैं, उन लोगों के समीप वर्त्तमान होकर विद्यासम्बन्धी व्यवहार के आनन्द को प्राप्त होओ ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।