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Rigveda Mandal 3 / Sukta 43 / Mantra 6

62 Sukta
8 Mantra
3/43/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ त्वा॑ बृ॒हन्तो॒ हर॑यो युजा॒ना अ॒र्वागि॑न्द्र सध॒मादो॑ वहन्तु। प्र ये द्वि॒ता दि॒व ऋ॒ञ्जन्त्याताः॒ सुसं॑मृष्टासो वृष॒भस्य॑ मू॒राः॥

आ । त्वा॒ । बृ॒हन्तः॑ । हर॑यः । यु॒जा॒नाः । अ॒र्वाक् । इ॒न्द्र॒ । स॒ध॒ऽमादः॑ । व॒ह॒न्तु॒ । प्र । ये । द्वि॒ता । दि॒वः । ऋ॒ञ्जन्ति॑ । आताः॑ । सुऽस॑म्मृष्टासः । वृ॒ष॒भस्य॑ । मू॒राः ॥

Mantra without Swara
आ त्वा बृहन्तो हरयो युजाना अर्वागिन्द्र सधमादो वहन्तु। प्र ये द्विता दिव ऋञ्जन्त्याताः सुसंमृष्टासो वृषभस्य मूराः॥

आ। त्वा। बृहन्तः। हरयः। युजानाः। अर्वाक्। इन्द्र। सधऽमादः। वहन्तु। प्र। ये। द्विता। दिवः। ऋञ्जन्ति। आताः। सुऽसम्मृष्टासः। वृषभस्य। मूराः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त सेवा करने योग्य विद्वान् ! (ये) जो (बृहन्तः) बड़े (युजानाः) समाधान देते हुए (सधमादः) समान स्थानवाले (हरयः) उत्तमप्रकार शिक्षित घोड़ों के सदृश अग्नि आदि पदार्थ (त्वा) आपको (आ) सब प्रकार (वहन्तु) एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचावें और वे तथा (द्विता) दो-दो पदार्थों का होना जैसे वैसे विद्वान् (दिवः) विद्याओं से प्रकाशमानों को (ऋञ्जन्ति) सिद्ध करते हैं (सुसंमृष्टासः) वा श्रेष्ठ रीति से उत्तम प्रकार शुद्ध किये हुए (आताः) व्याप्त हुई दिशाओं के सदृश (वृषभस्य) बलवान् पदार्थ के वेग को (प्र, वहन्तु) प्राप्त हों उनसे जो (मूराः) मूढ़ होवें उन पुरुषों को (अर्वाक्) नीचे के स्थल में आप पहुँचाइये ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग घोड़ों के सदृश अभीष्ट स्थान में मूढ़ों को पहुँचाते हैं, वे संपूर्ण समृद्धि सिद्ध कर सकते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।