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Rigveda Mandal 3 / Sukta 43 / Mantra 5

62 Sukta
8 Mantra
3/43/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कु॒विन्मा॑ गो॒पां कर॑से॒ जन॑स्य कु॒विद्राजा॑नं मघवन्नृजीषिन्। कु॒विन्म॒ ऋषिं॑ पपि॒वांसं॑ सु॒तस्य॑ कु॒विन्मे॒ वस्वो॑ अ॒मृत॑स्य॒ शिक्षाः॑॥

कु॒वित् । मा॒ । गो॒पाम् । कर॑से । जन॑स्य । कु॒वित् । राजा॑नम् । म॒घ॒ऽव॒न् । ऋ॒जी॒षि॒न् । कु॒वित् । मा॒ । ऋषि॑म् । प॒पि॒ऽवांस॑म् । सु॒तस्य॑ । कु॒वित् । मे॒ । वस्वः॑ । अ॒मृत॑स्य । शिक्षाः॑ ॥

Mantra without Swara
कुविन्मा गोपां करसे जनस्य कुविद्राजानं मघवन्नृजीषिन्। कुविन्म ऋषिं पपिवांसं सुतस्य कुविन्मे वस्वो अमृतस्य शिक्षाः॥

कुवित्। मा। गोपाम्। करसे। जनस्य। कुवित्। राजानम्। मघऽवन्। ऋजीषिन्। कुवित्। मा। ऋषिम्। पपिऽवांसम्। सुतस्य। कुवित्। मे। वस्वः। अमृतस्य। शिक्षाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वज्जन ! जो आप (जनस्य) सब लोगों के (कुवित्) श्रेष्ठ (गोपाम्) धार्मिक पुरुषों के रक्षा करनेवाले (मा) मुझको (करसे) करें। हे (मघवन्) परम प्रशंसनीय धनयुक्त (ऋजीषिन्) कोमलपन को चाहनेवाले जो आप जनसमूह का (राजानम्) राजा करें वह (सुतस्य) उत्पन्न किये हुए सोम के रस को (पपिवांसम्) पीते हुए (कुवित्) श्रेष्ठ (ऋषिम्) सम्पूर्ण वेदों के अर्थ के जाननेवाले होने की (मा) मुझको (शिक्षाः) शिक्षा दीजिये और आप (कुवित्) श्रेष्ठ (अमृतस्य) नाश से रहित (मे) मेरे (वस्वः) धन को करें, उन आपकी हम लोग सेवा करें ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो लोग आप लोगों को विद्या विनय और उत्तम शिक्षादान से बड़े राजा करते और वेद के अर्थों को समझा के मोक्ष सिद्ध करते हैं, उनको आप अपने आत्मा के सदृश प्रसन्न करें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।