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Rigveda Mandal 3 / Sukta 43 / Mantra 2

62 Sukta
8 Mantra
3/43/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ या॑हि पू॒र्वीरति॑ चर्ष॒णीराँ अ॒र्य आ॒शिष॒ उप॑ नो॒ हरि॑भ्याम्। इ॒मा हि त्वा॑ म॒तयः॒ स्तोम॑तष्टा॒ इन्द्र॒ हव॑न्ते स॒ख्यं जु॑षा॒णाः॥

आ । या॒हि॒ । पू॒र्वीः । अति॑ । च॒र्ष॒णीः । आ । अ॒र्यः । आ॒ऽशिषः॑ । उप॑ । नः॒ । हरि॑ऽभ्याम् । इ॒माः । हि । त्वा॒ । म॒तयः॑ । स्तोम॑ऽतष्टाः । इन्द्र॑ । हव॑न्ते । स॒ख्यम् । जु॒षा॒णाः ॥

Mantra without Swara
आ याहि पूर्वीरति चर्षणीराँ अर्य आशिष उप नो हरिभ्याम्। इमा हि त्वा मतयः स्तोमतष्टा इन्द्र हवन्ते सख्यं जुषाणाः॥

आ। याहि। पूर्वीः। अति। चर्षणीः। आ। अर्यः। आऽशिषः। उप। नः। हरिऽभ्याम्। इमाः। हि। त्वा। मतयः। स्तोमऽतष्टाः। इन्द्र। हवन्ते। सख्यम्। जुषाणाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) बहुत ऐश्वर्य्यों के देनेवाले ! जो (इमाः) इन वर्त्तमान (स्तोमतष्टाः) विस्तारयुक्त स्तुतियों से विशिष्ट और (सख्यम्) मित्रता का (जुषाणाः) सेवन करती हुई (मतयः) बुद्धियाँ (त्वा) आपको (आ, हवन्ते) ग्रहण करती हैं उनके साथ (नः) हम लोगों को (आ) सब प्रकार (याहि) प्राप्त हूजिये, जिस प्रकार (अर्य्यः) स्वामी (चर्षणीः) मनुष्य आदि प्रजाओं को प्राप्त होकर (आशिषः) आशीर्वादों को प्राप्त होता है वैसे उन (पूर्वीः) प्राचीन काल में उत्पन्न हुई आशिषों को (हि) ही (हरिभ्याम्) वायु और अग्नि से (अति, आ) सब ओर से अत्यन्त प्राप्त हूजिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस बुद्धि से सब लोगों के साथ मित्रता हो, उससे युक्त हुए सबके आशीर्वादों को प्राप्त होकर सुख को निरन्तर प्राप्त होइये ॥२॥
Subject
अब मित्रता के गुण के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।