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Rigveda Mandal 3 / Sukta 42 / Mantra 9

62 Sukta
9 Mantra
3/42/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वां सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ प्र॒त्नमि॑न्द्र हवामहे। कु॒शि॒कासो॑ अव॒स्यवः॑॥

त्वाम् । सु॒तस्य॑ । पी॒तये॑ । प्र॒त्नम् । इ॒न्द्र॒ । ह॒वा॒म॒हे॒ । कु॒शि॒कासः॑ । अ॒व॒स्यवः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वां सुतस्य पीतये प्रत्नमिन्द्र हवामहे। कुशिकासो अवस्यवः॥

त्वाम्। सुतस्य। पीतये। प्रत्नम्। इन्द्र। हवामहे। कुशिकासः। अवस्यवः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (इन्द्र) सुख के दाता ! (कुशिकासः) विद्या और विनय आदिकों से श्रेष्ठ हुए (अवस्यवः) आप लोगों के आत्माओं की रक्षा की इच्छा करनेवाले हम लोग (सुतस्य) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त रस के (पीतये) पान करने के लिये जिस (प्रत्नम्) प्राचीन काल से सिद्ध (त्वाम्) आपको (हवामहे) देवें, वह आप हम लोगों को बुलाइये ॥९॥
Essence
नवीन विद्वानों से प्राचीन विद्वान् श्रेष्ठ है, ऐसा निश्चय करना चाहिये ॥९॥ इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और सोम के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह बैयालीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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