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Rigveda Mandal 3 / Sukta 42 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/42/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तान्द॑धिष्व शतक्रतो। ज॒ठरे॑ वाजिनीवसो॥

इन्द्र॑ । सोमाः॑ । सु॒ताः । इ॒मे । तान् । द॒धि॒ष्व॒ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । ज॒ठरे॑ । वा॒जि॒नी॒व॒सो॒ इति॑ वाजिनीऽवसो ॥

Mantra without Swara
इन्द्र सोमाः सुता इमे तान्दधिष्व शतक्रतो। जठरे वाजिनीवसो॥

इन्द्र। सोमाः। सुताः। इमे। तान्। दधिष्व। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। जठरे। वाजिनीवसो इति वाजिनीऽवसो॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (वाजिनीवसो) रात्रि को वसानेवाले (शतक्रतो) बहुत कर्मों में कुशल (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के भोक्ता ! जो (इमे) ये (जठरे) प्रसिद्ध हुए इस संसार में (सोमाः) पदार्थ (सुताः) उत्पन्न हुए हैं उनको (दधिष्व) धारण करो ॥५॥
Essence
तभी मनुष्य पूर्ण विद्या और ऐश्वर्य्यवाले होवें कि जब सृष्टि में वर्त्तमान पदार्थों की विद्या को जानें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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