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Rigveda Mandal 3 / Sukta 42 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/42/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॒ स्तोमै॑रि॒ह ह॑वामहे। उ॒क्थेभिः॑ कु॒विदा॒गम॑त्॥

इन्द्र॑म् । सोम॑स्य । पी॒तये॑ । स्तोमैः॑ । इ॒ह । ह॒वा॒म॒हे॒ । उ॒क्थेभिः॑ । कु॒वित् । आ॒ऽगम॑त् ॥

Mantra without Swara
इन्द्रं सोमस्य पीतये स्तोमैरिह हवामहे। उक्थेभिः कुविदागमत्॥

इन्द्रम्। सोमस्य। पीतये। स्तोमैः। इह। हवामहे। उक्थेभिः। कुवित्। आऽगमत्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वज्जन ! हम लोग (स्तोमैः) प्रशंसा के वचन जो (उक्थेभिः) कहने के योग्य उनसे (सोमस्य) उत्तम प्रकार निकाले हुए बड़ी ओषधि के रस के (पीतये) पान करने के लिये जिस (इन्द्रम्) अत्यन्त विद्या और ऐश्वर्य्यवाले को (इह) इस संसार में (हवामहे) पुकारैं वह हम लोगों के समीप (कुवित्) बहुत बार (आगमत्) आवे ॥४॥
Essence
जो अविद्वान् लोग प्रीति से विद्वान् लोगों को बुलावें, तो वे उनके समीप बहुत वार जावें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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