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Rigveda Mandal 3 / Sukta 42 / Mantra 2

62 Sukta
9 Mantra
3/42/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तमि॑न्द्र॒ मद॒मा ग॑हि बर्हिः॒ष्ठां ग्राव॑भिः सु॒तम्। कु॒विन्न्व॑स्य तृ॒प्णवः॑॥

तम् । इ॒न्द्र॒ । मद॒म् । आ । ग॑हि ब॒र्हिः॒ऽस्थाम् । ग्राव॑ऽभिः । सु॒तम् । कु॒वित् । नु । अ॒स्य॒ । तृ॒ष्णवः॑ ॥

Mantra without Swara
तमिन्द्र मदमा गहि बर्हिःष्ठां ग्रावभिः सुतम्। कुविन्न्वस्य तृप्णवः॥

तम्। इन्द्र। मदम्। आ। गहि बर्हिःऽस्थाम्। ग्रावऽभिः। सुतम्। कुवित्। नु। अस्य। तृप्णवः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 5 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले ! जो (अस्य) इस सोमलता की (तृप्णवः) तृप्ति करनेवाले हैं उनसे (कुवित्) श्रेष्ठ होकर (तम्) उस पूर्वोक्त को (ग्रावभिः) मेघों से (सुतम्) उत्पन्न (मदम्) आनन्दकारक (बर्हिष्ठाम्) अन्तरिक्ष में वर्त्तमान होनेवाले ओषधिगणों के सदृश वर्त्तमान ऐश्वर्य को (नु) शीघ्र (आ, गहि) सब प्रकार प्राप्त हूजिये ॥२॥
Essence
जो सोमलता आदि ओषधियाँ वृष्टियों से उत्पन्न होतीं रोगविनाशक होने से तृप्तिकारक होतीं और सूक्ष्म अवयवों के द्वारा अन्तरिक्ष को प्राप्त हो के सब स्थानों में फैलती हैं, उनका युक्ति से सेवन करके सदा आनन्द का भोग करना चाहिये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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