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Rigveda Mandal 3 / Sukta 41 / Mantra 8

62 Sukta
9 Mantra
3/41/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मारे अ॒स्मद्वि मु॑मुचो॒ हरि॑प्रिया॒र्वाङ् या॑हि। इन्द्र॑ स्वधावो॒ मत्स्वे॒ह॥

मा । आ॒रे । अ॒स्मत् । वि । मु॒मु॒चः॒ । हरि॑ऽप्रिय । आ॒र्वाङ् । या॒हि॒ । इन्द्र॑ । स्व॒धा॒ऽवः॒ । मत्स्व॑ । इ॒ह ॥

Mantra without Swara
मारे अस्मद्वि मुमुचो हरिप्रियार्वाङ् याहि। इन्द्र स्वधावो मत्स्वेह॥

मा। आरे। अस्मत्। वि। मुमुचः। हरिऽप्रिय। आर्वाङ्। याहि। इन्द्र। स्वधाऽवः। मत्स्व। इह॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हरिप्रिय) हरनेवालों को प्रसन्न करनेवाले (इन्द्र) ऐश्वर्य्य में युक्त (स्वधावः) बहुत अन्नादि वस्तुओं से पूर्ण आप (अस्मत्) हम लोगों से (आरे) समीप वा दूर देश में (मा) मत (वि, मुमुचः) त्याग करिये (अर्वाङ्) नीचे के स्थान को जाते हुए (याहि) जाइये और (इह) इस संसार में (मत्स्व) आनन्द करिये ॥८॥
Essence
हे मित्रजनों ! आप लोग हम लोगों से दूर वा समीप स्थान में वर्त्तमान हुए हम लोगों का कल्याण करो और प्रीति का त्याग मत करो और हम लोग भी आप लोगों में ऐसा ही वर्त्ताव करें, इस प्रकार परस्पर वर्त्ताव करके इस संसार में सुखी होवें ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।