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Rigveda Mandal 3 / Sukta 41 / Mantra 7

62 Sukta
9 Mantra
3/41/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॑ ह॒विष्म॑न्तो जरामहे। उ॒त त्वम॑स्म॒युर्व॑सो॥

व॒यम् । इ॒न्द्र॒ । त्वा॒ऽयवः॑ । ह॒विष्म॑न्तः । ज॒रा॒म॒हे॒ । उ॒त । त्वम् । अ॒स्म॒ऽयुः । व॒सो॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
वयमिन्द्र त्वायवो हविष्मन्तो जरामहे। उत त्वमस्मयुर्वसो॥

वयम्। इन्द्र। त्वाऽयवः। हविष्मन्तः। जरामहे। उत। त्वम्। अस्मऽयुः। वसो इति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 4 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे (वसो) निवास के कारण (इन्द्र) ऐश्वर्य्य से और (हविष्मन्तः) बहुत देने योग्य वस्तुओं से युक्त ! (त्वायवः) आपकी कामना करते हुए (वयम्) हम लोग आपकी (जरामहे) प्रशंसा करें (उत) और भी (त्वम्) आप (अस्मयुः) हम लोगों की कामना करते हुए हम लोगों की प्रशंसा करो ॥७॥
Essence
जो मनुष्य सब लोगों के गुणों की प्रशंसा और दोषों की निन्दा करें, वे विवेकी अर्थात् विचारशील होके गुणों के ग्रहण करने और दोषों के त्याग करने को समर्थ होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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