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Rigveda Mandal 3 / Sukta 41 / Mantra 2

62 Sukta
9 Mantra
3/41/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒त्तो होता॑ न ऋ॒त्विय॑स्तिस्ति॒रे ब॒र्हिरा॑नु॒षक्। अयु॑ज्रन्प्रा॒तरद्र॑यः॥

स॒त्तः । होता॑ । नः॒ । ऋ॒त्वियः॑ । ति॒स्ति॒रे । ब॒र्हिः । आ॒नु॒षक् । अयु॑ज्रन् । प्रा॒तः । अद्र॑यः ॥

Mantra without Swara
सत्तो होता न ऋत्वियस्तिस्तिरे बर्हिरानुषक्। अयुज्रन्प्रातरद्रयः॥

सत्तः। होता। नः। ऋत्वियः। तिस्तिरे। बर्हिः। आनुषक्। अयुज्रन्। प्रातः। अद्रयः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सत्तः) बैठा हुआ (होता) ग्रहण करनेवाला और (ऋत्वियः) जो ऋतु को योग्य होता वा (आनुषक्) अनुकूलता के साथ मिलता ये (नः) हम लोगों के लिये (बर्हिः) उत्तम आसन वा वस्तु को (अद्रयः) मेघों के सदृश (प्रातः) प्रातःकाल में (अयुज्रन्) युक्त करते हैं और (तिस्तिरे) वस्त्रों से आच्छादन करते हैं, वे क्रियारूप यज्ञ करने को योग्य हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातकाल से मेघ सूर्य्य के प्रकाश का आच्छादन करके छाया को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही क्रियाओं को जाननेवाले लोग वस्त्र आदि पदार्थों से शरीरों को ढाँप के अनुकूलता से सुख को उत्पन्न करते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।