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Rigveda Mandal 3 / Sukta 40 / Mantra 8

62 Sukta
9 Mantra
3/40/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॑हि परा॒वत॑श्च वृत्रहन्। इ॒मा जु॑षस्व नो॒ गिरः॑॥

अ॒र्वा॒ऽवतः॑ । नः॒ । आ । ग॒हि॒ । प॒रा॒ऽवतः॑ । च॒ । वृ॒त्र॒ह॒न् । इ॒माः । जु॒ष॒स्व॒ । नः॒ । गिरः॑ ॥

Mantra without Swara
अर्वावतो न आ गहि परावतश्च वृत्रहन्। इमा जुषस्व नो गिरः॥

अर्वाऽवतः। नः। आ। गहि। पराऽवतः। च। वृत्रहन्। इमाः। जुषस्व। नः। गिरः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 2 Mantra » 3

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Meaning
हे (वृत्रहन्) धन को प्राप्त होनेवाले ! आप (अर्वावतः) प्रशंसा करने योग्य घोड़ों से युक्त (नः) हमलोगों को (परावतः) दूर देश से (च) और समीपे से (आ) सब ओर से (गाह) प्राप्त हूजिये और (नः) हम लोगों की (इमाः) इन (गिरः) वाणियों का (जुषस्व) सेवन करो ॥८॥
Essence
हे राजन् ! दूर वा समीप में स्थित सेना के अङ्ग शस्त्र आदि से युक्त वीर हम लोग जब आपको पुकारैं, उसी समय आपको आना चाहिये तथा हम लोगों के वचन सुनना और यथार्थ न्याय करना चाहिये ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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