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Rigveda Mandal 3 / Sukta 40 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/40/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तव॒ प्र य॑न्ति सत्पते। क्षयं॑ च॒न्द्रास॒ इन्द॑वः॥

इन्द्र॑ । सोमाः॑ । सु॒ताः । इ॒मे । तव॑ । प्र । य॒न्ति॒ । स॒त्ऽप॒ते॒ । क्षय॑म् । च॒न्द्रासः॑ । इन्द॑वः ॥

Mantra without Swara
इन्द्र सोमाः सुता इमे तव प्र यन्ति सत्पते। क्षयं चन्द्रास इन्दवः॥

इन्द्र। सोमाः। सुताः। इमे। तव। प्र। यन्ति। सत्ऽपते। क्षयम्। चन्द्रासः। इन्दवः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (सत्पते) सत्पुरुषों के रक्षा करने और (इन्द्र) सम्पूर्ण ओषधियों की विद्या के जाननेवाले राजन् ! जो (इमे) ये (चन्द्रासः) आनन्दकारक (इन्दवः) गीले (सुताः) उत्तमप्रकार से पाक आदि संस्कार से युक्त (सोमाः) ओषधी आदि पदार्थ (तव) आपके (क्षयम्) रहने के स्थान को (प्र, यन्ति) प्राप्त होते हैं, उनका आप सेवन करो ॥४॥
Essence
हे राजन् ! जितना आपको राज्य का भाग लेना चाहिये, उतना ही ग्रहण कर भोग करिये, न अधिक न न्यून, ऐसा करने से कभी नहीं आपकी हानि होगी ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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