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Rigveda Mandal 3 / Sukta 4 / Mantra 9

62 Sukta
11 Mantra
3/4/9
Devata- आप्रियः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तन्न॑स्तु॒रीप॒मध॑ पोषयि॒त्नु देव॑ त्वष्ट॒र्वि र॑रा॒णः स्य॑स्व। यतो॑ वी॒रः क॑र्म॒ण्यः॑ सु॒दक्षो॑ यु॒क्तग्रा॑वा॒ जाय॑ते दे॒वका॑मः॥

तत् । नः॒ । तु॒रीप॑म् । अध॑ । पो॒ष॒यि॒त्नु । देव॑ । त्व॒ष्टः॒ । वि । र॒रा॒णः । स्य॒स्वेति॑ स्यस्व । यतः॑ । वी॒रः । क॒र्म॒ण्यः॑ । सु॒ऽदक्षः॑ । यु॒क्तऽग्रा॑वा । जाय॑ते । दे॒वऽका॑मः ॥

Mantra without Swara
तन्नस्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टर्वि रराणः स्यस्व। यतो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः॥

तत्। नः। तुरीपम्। अध। पोषयित्नु। देव। त्वष्टः। वि। रराणः। स्यस्वेति स्यस्व। यतः। वीरः। कर्मण्यः। सुऽदक्षः। युक्तऽग्रावा। जायते। देवऽकामः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 23 Mantra » 4

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Meaning
हे (देव) दिव्य गुणों के देनेवाले ! (त्वष्टः) छिन्न-भिन्न कर्ता (रराणः) रमण करते हुए आप (नः) हमारी जो (तुरीपम्) शीघ्रकर्ता यज्ञ (अध) इसके अनन्तर (पोषयित्नु) पुष्टि की करनेवाली यज्ञक्रिया (तत्) उन दोनों को (वि, स्यस्व) बीच में करो जिससे हम लोगों के कुल में (सुदक्षः) उत्तम बली (युक्तग्रावा) जिसमें मेघयुक्त हैं (कर्मण्यः) जो कर्म से सिद्ध होता है (देवकामः) और दिव्यगुणों वा विद्वानों की कामना करता ऐसा (वीरः) शुभगुणों में व्याप्त होनेवाला वीरपुरुष (जायते) उत्पन्न होता है ॥९॥
Essence
जो विद्वान् जन हमारे लिये दुःख से तारने और पुष्टि करनेवाले उपदेश को करें, उन्हें शुभ गुण-कर्म-स्वभाव की कामना करनेवाले हम लोग सदैव सेवें, जिससे हमारा कुल उत्कर्ष उन्नति को प्राप्त हो ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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